17 जुलाई 2020 - 18:32
चीन ईरान में 25 साल का समझौता, जी नहीं! ईरान चीन की कठपुतली नहीं बनेगा! अमरीकी संस्था का दिलचस्प अध्ययन

अमरीकी थिंक टैंक एटलांटिक परिषद में ब्रांडन हंग ने एक लेख लिखा है जो ईरान और चीन के बीच 25 वर्ष के व्यापक समझौते के बारे में है। काफी रोचक है यह लेख।

 ब्रांडन हंग लिखते हैं कि इस्लामी गणतंत्र ईरान, चीन के साथ समझौते को अंतिम रूप दे रहा है जिसमें दुनिया की दूसरी सब से बड़ी अर्थ व्यवस्था को अगले 25 वर्षों तक तेल बेचने का प्रावधान है। ईरान व चीन के मध्य 25 वर्षीय सहयोग दस्तावेज़ के रूप में 18 पेज प्रकाशित होने के बाद उस पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

     इराक़ हर रोज़ एक लाख बैरल कच्चा तेल, चीन को निर्यात करता है और उसने भी चीन के साथ 20 वर्षीय सहयोग समझौते पर सहमति की है और उसे भी ईरान की तरह जनमत के दबाव का सामना है। पाकिस्तान, नेपाल, कम्बोडिया, मिंयामार और उत्तरी कोरिया जैसे कई देशों पर भी इसी तरह का आरोप है।

     चीन और ईरान अभी इस समझौते को अंतिम रूप दे रहे हैं और उसका ब्योरा अभी किसी भी देश ने नहीं बताया है लेकिन इस समय तेहरान को पास इस समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं है। बीजिंग के लिए यह समझौते वन बेल्ट और सिल्क रोड के शी जिनपिंग की नयी योजना के अंतर्गत उठाया जाने वाला क़दम है। वह न्यू सिल्क रोड परियोजना पर काम करके एशिया के दसियों देशों को युरोप और अफ्रीका से जोड़ने का इरादा रखते हैं। इस परियोजना को लागू करना,  शी जिनपिंग की एक बुनियादी नीति है। इस योजना के समर्थकों का कहना है कि यह महत्वकांक्षी परियोजना, बहुत से विकासशील देशों में जीवन स्तर में असाधारण रूप से बेहतरी का कारण बनेगी जबकि इस परियोजना के विरोधी इसे चीन का कूटनयिक जाल कहते हैं।

  इस तरह के समझौते के लिए हालात बहुत अधिक उचित हैं जिसके बाद अब चीन ईरान के मूल भूत ढांचे, आर्थिक और सैनिक विकास के क्षेत्र में अरबों डालर का निवेश कर सकता है। ईरान के तेल प्रतिष्ठानों और नवीनीकरण की ज़रूरत है और इस समझौते द्वारा यही काम किया जाएगा। निश्चित रूप से यह समझौता ट्रम्प सरकार की उन उम्मीदों के विपरीत हैं जिनमें वह अधिकतम दबाव डाल कर ईरान की अर्थ व्यवस्था को तबाह करने की सोच रहे थे।

     सच्चाई यह है कि चीन और ईरान को एक दूसरे की ज़रूरत है। चीन को तेल की ज़रूरत है और इस समय भी वह ईरान के तेल का सब से बड़ा खरीदार है। बीजिंग इसी तरह से यह भी कोशिश कर रहा है कि खुद को विकासशील देशों का अगुवा सिद्ध करे अर्थात उन देशों का जिनकी अमरीका ने हमेशा अनेदखी की है और वह देश विकास की दौड़ में पीछे रह गये हैं। दूसरी ओर ईरान असाधारण मंदी से जूझ रहा है जिसका एक बड़ा हिस्सा अमरीका द्वारा दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने की वजह से है।

     दक्षिण पूर्वी और दक्षिण एशियाई देशों में चीन के आक्रामक रूख के बावजूद चीन पश्चिमी एशिया पर अधिक ध्यान देने में रूचि नहीं रखता। एसा लगता है कि चीन इस क्षेत्र में सब से अधिक ऊर्जा की सुरक्षा को लेकर चिंतित है और वह इसी लिए अपनी आर्थिक व सैन्य शक्ति बढ़ा रहा है।

     चीन के अन्य देशों के साथ जो समझौते हुए हैं उनकी तुलना में अगर चीन और ईरान के मध्य समझौता जारी रहता है तो वह एक ध्यान योग्य समझौता होगा। सन 2013 में यानि शी जिनपिंग के सत्ता में आने के एक साल बाद चीन के राष्ट्रपति ने रूस के साथ 270 अरब डालर के तेल समझौते पर हस्ताक्षर किया। आज दोनों देशों के मध्य जियोपालिटिकल प्रतिस्पर्धा के बावजूद यह समझौता जारी है। वह भी एसे हालात में कि जब रूस आज गैर ओपक देशों में तेल का सब से बड़ा भंडार रखने वाला देश है। इसी साल मार्च में जब रूस के तेल की मांग युरोप में कम हो गयी तो चीन ने चार हफ्ते के दौरान रूस से 16  लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा।

दूसरे शब्दों में चीन को तेल की प्यास है। सन 2019 में चीन ने प्रतिदिन एक करोड़ चालीस लाख बैरल तेल का इस्तेमाल किया जिसका बड़ा भाग उत्पादन क्षेत्र और लोगों की कारों में प्रयोग किया गया। चीन, अधिक आर्थिक विकास और इसी तरह ताइवान स्ट्रेट , दक्षिणी चीन सागर, बल्कि हिमालय में भारत के साथ भी टकराव की आंशका की वजह से तेल का भंडारण कर रहा है। कुल मिलाकर सच्चाई यह है कि चीन अपनी रिफाइनरियों को लगातार बढ़ा रहा है।

          इसके अलावा चीन ने विदेशों से तेल आयात करने के मामले में अमरीका को पीछे छोड़ दिया है। पिछले साल चीन ने हर दिन एक करोड़ तेल आयात किया है।

     ईरान और चीन के बीच 25 वर्षों के सहयोग की बात पहली बार सन 2016 में शी जिनपिंग ने तेहरान की यात्रा के दौरान की थी। इस समझौते में सब से अधिक तेल पर ध्यान दिया गया है। ईरान में 5जी तकनीक का विकास भी समझौते में शामिल है । सुरक्षा के क्षेत्र में यह तय हुआ है कि ईरान, चीन और रूस के बीच अधिक मज़बूत सैन्य संबंध बनेंगे विशेषकर संयुक्त ट्रेनिंग, हथियारों के विकास और सूचनाओं के आदान प्रदान में तीनों देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा। कुछ ही दिन पहले ईरान चीन और रूस ने संयुक्त युद्धाभ्यास किया था। इन हालात में फार्स की खाड़ी में अमरीका की उपस्थिति पर इन तीनों देशों के संबंधों का प्रभाव, क्षेत्र में सैन्य उपस्थति में चीन की रूचि पर निभर्र करता है।यह कहना कि ईरान ने खुद को पूरी तरह से चीन के हवाले कर दिया है सही नहीं है। चीन के पास अस्थिर क्षेत्रों में अपना प्रभाव बनाए रखने का अनुभव कम है। तेहरान परमाणु समझौते के तहत दुनिया के बड़े देशों के साथ सहमित तक पहुंच गया था जिनमें अमरीका भी शामिल था मगर वाशिंग्टन के पीछे हटने से यह समझौते बिखर गया। इस आधार पर यह स्वाभाविक है कि तेहरान अन्य क्षेत्रों में विकल्प तलाश करे। तेहरान और बीजिंग के मध्य प्रस्तावित समझौता, ईरान की बड़ी शक्तियों से निराशा , तीन के महाशक्ति के रूप में उदय और इसी तरह पश्चिमी एशिया में अमरीका के प्रभाव में कमी का चिन्ह है। पश्चिमी एशिया में जहां भी अमरीका और उसके युरोपी घटक पीछे हटेंगे चीन उनकी जगह लेने पर पूरी तरह से तैयार है।Q.A. लेख में कही गयी बातों से पार्स टूडे का सहमत होना आवश्यक नहीं।