भारतीय अख़बार द हिंदू ने एक विशेष रिपोर्ट में कहा था कि अमरीकी प्रतिबंधों के कारण, भारत द्वारा प्रोजेट्क के लिए धन उपलब्ध कराने में देरी के कारण, तेहरान ने नई दिल्ली को इस रणनीतिक प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया है और ख़ुद ही इसे आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है।
ईरान के बंदरगाहों और जहाज़रानी संगठन के वरिष्ठ अधिकारी फ़रहाद मुन्तसिर ने इस पूरी कहानी को सरासर झूठ बताते हुए कहा है कि ईरान ने ज़ाहेदान-चाबहार रेलवे प्रोजेक्ट के संबंध में भारत के साथ कोई समझौता ही नहीं किया था।
इरना न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, मुन्तसिर का कहना थाः ईरान ने चाबहार में निवेश को लेकर भारत के साथ सिर्फ़ दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे, एक बंदरगाह की मशीनरी और उपकरणों से संबंधित है, और दूसरा भारत द्वारा 150 मिलियन डॉलर के निवेश से संबंधित है।
उन्होंने आगे कहाः चाबहार बंदरगाह में भारतीय निवेश के लिए हमने एक लिस्ट तैयार की थी, जिसमें चाबहार रेलवे के बुनियादी ढांचे और रेलवे लाइन बिछाने का मुद्दा भी शामिल था, लेकिन वार्ता के दौरान इस पर सहमति नहीं बन सकी।
उन्होंने यह भी कहा कि चाबहार में ईरान-भारत सहयोग में प्रतिबंधों की कोई भूमिका नहीं है।
द हिंदू ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ईरान सरकार ने भारत की भागीदारी के बिना ही लंबे समय से रुकी चाबहार-ज़ाहेदान, रेल परियोजना को जिसमें अफ़ग़ानिस्तान के ज़रंज को भी शामिल किया जाएगा, आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है और इस पर काम भी शुरू कर दिया है।
पिछले ही हफ़्ते ईरान के परिवहन और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने 628 किलोमीटर लम्बी रेलवे परियोजना का उद्घाटन किया था।
द हिंदू अख़बार का यह भी कहना था कि तेहरान का यह क़दम नई दिल्ली के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि ऐसे समय में जब भारत और चीन के बीच तनाव जारी है, भारत का पारम्परिक सहयोगी ईरान चीन के साथ 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी का समझौता करने जा रहा है।
ग़ौरतलब है कि मई 2016 में, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर के लिए तेहरान की यात्रा की थी, उसी दौरान भारतीय रेलवे ने ईरानी रेल मंत्रालय के साथ चाबहार-ज़ाहेदान रेल प्रोजेक्ट में सहोयग के एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे।
जैसा कि ईरानी बंदरगाहों और जहाज़रानी संगठन के वरिष्ठ अधिकारी मुन्तसिर का कहना है कि वार्ता के बाद, दोनों देशों के बीच यह समझौता नहीं हो पाया था, इसलिए भारत को इस परियोजना से निकालने की रिपोर्टों का कोई मतलब ही नहीं है।