1996 में मोहम्मद अमग़र ने जब सॉफ़्टवेयर सेल्स मैनेजर की नई नौकरी के लिए आवेदन किया था तो उनकी उम्र 40 वर्ष थी। कंपनी ने उन्हें नौकरी देने के साथ ही उन पर उनकी मुस्लिम पहचान बदलने का दबाव डाला और उनसे कहा कि उन्हें अपना नाम एंटोनी रखना होगा।
मोहम्मद अमग़र यह सुनकर दंग रह गए और उन्हें शर्मिंदगी का अहसास होने का साथ बहुत ग़ुस्सा भी आया, लेकिन उनके पास उस समय कोई और विकल्प भी नहीं था।
पेरिस में जन्म लेने वाले मोहम्मद ने इसे अपने साथ विश्वासघात बताया। उनका कहना है कि 40 साल की उम्र में आपको बताया जाता है कि अगर आप मोहम्मद हैं तो आप बाक़ी फ़्रांसीसी नागरिकों की तरह वास्तविक फ़्रेंच नहीं हैं।
इसलिए मोहम्मद को एंटोनी बना दिया गया और 20 वर्षों तक उन्हें इसी पहचान के साथ रहने के लिए मजबूर किया गया।
अब 63 वर्ष के हो चुके मोहम्मद ने एक श्रम अदालत में मुक़दमा दायर किया है, जिसमें भेदभाव और नैतिक उत्पीड़न का आरोप लगाकर कंपनी से 500,000 डॉलर के हर्जाने की मांगा की है।
मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करने वाले यह एक ऐसे यूरोपीय देश की कहानी है, जो ख़ुद को धर्म निरपेक्ष बताता है, लेकिन जब बात इस्लाम और मुसलमानों की आती है तो भेदभाव एक सामान्य सी बात बन जाती है।
मोहम्मद अमग़र बहुत ही दुखी लहजे में कहते हैं, मेरे जैसे लोगों को अच्छी नौकरी पाने के लिए, प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए, बाक़ी नागरिकों की तरह जीवन गुज़ारने के लिए हतोत्साहित किया जाता है और मूल अधिकारों से वंचित किया जाता है। इससे समाज में मौजूद पाखंड का पता चलता है।
उन्होंने कहा, सच्चाई यह है कि मेरा सिर्फ़ एक नाम है, मेरे पास केवल एक राष्ट्रीयता है। "मेरा नाम मोहम्मद है और मैं फ्रांसीसी हूं।