10 जुलाई 2020 - 18:49
क्या लेबनान में अमरीका की नीतियां सफल होंगी या फिर से वाशिंग्टन को मुंह की खानी पड़ेगी

हर देश की सफल विदेश नीति के सिद्धांतों में से एक है कि वह जिस देश में अपनी नीतियां लागू करना चाहता है या जिस समाज पर अपनी नीतियां थोपना चाहता है उस देश और समाज को अच्छी तरह समझता हो। यहीं पर यह सवाल पैदा होता है कि क्या लेबनान में अमरीकी नीतियां सफल रहेंगी? इसका जवाब न में है क्योंकि दोनों के ही बीच कोई मेल नहीं है और इसकी वजह यह है कि अमरीका, लेबनान को अच्छी तरह समझ नहीं पाया है।

लेबनान के बारे में अमरीकी नीतियां पिछले कुछ दशक के दौरान, हमेशा से इस्राईल की सुरक्षा और उसके हितों की रक्षा पर केन्द्रित रही है। इन वास्तविकताओं को देखने और इन पर भरोसा करने से बैरूत के बारे में अमरीका की हालिया महीनों में होने वाली गतिविधियों की समीक्षा की जा सकती है।  

जी हां, लेबनान के सुधार के लिए अमरीकी की ओर से दी जाने वाली मदद की शुरुआत से ही इस्राईल की सुरक्षा और लेबनान की सैन्य और आर्थिक गतिविधियों को रोकने के लिए थी ताकि यह देश, इस्राईल के साथ टकराने की पोज़ीशन में न रहे।

लेबनान की वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही अर्थात सात महीना पहले ही इस देश को अभूतपूर्व आर्थिक युद्ध का सामना करना पड़ा जिसका कारण परिवेष्टन, दंड और धमकी रहा है। यहां पर यह सवाल पैदा होता है कि लेबनान को वर्तमान सरकार से पहले इस प्रकार की समस्याओं का सामना क्यों नहीं करना पड़ा? दूसरा सवाल यह है कि इस युद्ध का लक्ष्य क्या है?

पहले सवाल के जवाब में यह कहा जा सकता है कि लेबनान की पूर्ववर्ती सरकारें, हिज़्बुल्लाह के शामिल होने के बावजूद अमरीका और उसके घटकों से बहुत निकट रही और उसका झुकाव उनकी ओर बहुत अधिक था किन्तु वर्तमान सरकार स्वतंत्र है और इस प्रकार कोई हरकत नहीं कर रही है और इसी के साथ इस सरकार में वे राजैतिक पार्टियां शामिल नहीं हैं जो यह खुलकर कहती हैं कि उनके कुछ अरब देशों के साथ गहरे संबंध हैं जबकि कुछ पार्टियां यहां तक कहती थीं कि वे वाशिंग्टन की समर्थक हैं। वाशिंग्टन, लेबनान की वर्तमान सरकार को हिज़्बुल्लाह की सरकार का नाम देता है।

यहां पर यह भी कहना आवश्यक है कि लेबनान की पूर्व सरकारों ने अमरीका की मर्ज़ी के बजाए ख़ुद की अपने पैरों पर खड़े होने की कभी कोशिश नहीं की जबकि वर्तान सरकार चाहे वह सफल होती है या विफल, यह प्रयास कर रही है कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो और यहीं से पूरब की ओर नज़र की बात सामने आने लगी।  

पूरब पर नज़र का मामला अमरीकियों को ज़्यादा पसंद नहीं आता क्योंकि पहली नज़र में इसका अर्थ लेबनान की आर्थिक समस्याओं का हल है जिसे वाशिंग्टन अपनी योजनाओं और नीतियों के साथ कड़ा करना चाहता है।

यह लेबनान की सरकार और हिज़्बुल्लाह और उसके घटकों की एक और सफलता समझा जाताहै जिसका लेबनन के सभी वर्ग और पार्टियां समर्थन करते हैं।

यह अमरीकी सरकार के लिए अच्छी ख़बर नहीं थी और वह इस तरह की ख़बरें सुनने की आदी भी नहीं है। अब बैरूत में अमरीकी दूतावास बेकार नहीं बैठा और पूरी तरह सक्रिय हो गया और अमरीकी राजदूत डोर्थी शीया ने जो इससे पहले इस्राईल में अमरीकी राजदूत थीं, भड़काऊ कार्यवाहियों का सहारा लिया और खेद की बात यह है कि कुछ लेबनानी गुटों के सहयोग से लेबनान के कुछ अधिकारियों को बुलाया और उन्हें खुलकर धमकी दी कि सरकार के कामों का समर्थन न करें।

इन विषयों में से सबसे बड़ा मुद्दा ईरान से लेबनानी लीरे या पाउंड के बदले तेल की ख़रीदारी थी जैसा कि हिज़्बुल्लाह के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह ने बयान किया। यह वह चीज़ थी जिससे लेबनानी सरकार के ख़ज़ाने में ढेर सारे पैसे आते और देश की आर्थिक गतिविधियों के पहिए चलाने के लिए बिजली की आपूर्ती होती। अभी बुधवार को ही अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो ने खुलकर कहा कि उनका देश, लेबनान को ईरान से तेल ख़रीदने की अनुमति नहीं देगा।

अब यहां पर यह सवाल पैदा होता है कि यह बात क्यों नहीं सुनी जाती है कि वह इस्राईल को मिस्र को गैस बेचने की अनुमति नहीं देगा। इसी तरह यह भी नहीं सुनाई देता कि वाशिंग्टन कहे कि सऊदी अरब द्वारा इस्राईल को तेल बेचने की इजाज़त नहीं देगा । बात को पूरी तरह समझ में आती है कि यह केवल एक राजनीति है। अब मामला यह है कि क्यों अमरीका ने ख़ुद को इस बात का ठेकेदार बना लिया है कि वह ईरान को लेबनान को तेल बेचने से रोक दे। तेल का यह सौदा सारे लेबनानियों के हक़ में होगा और हिज़्बुल्लाह और ईरान की समस्त विरोधी पार्टियों सहित सारे लेबानानियों की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी।  

यहां पर यह कहना ज़रूरी है कि अमरीका की नीतियां और इस देश के षड्यंत्र, दूसरे देशों पर कभी भी सफल नहीं होंगे क्योंकि राष्ट्र पहले से ज़्यादा मज़बूत और स्वतंत्र हो चुके हैं क्योंकि अमरीका आजतक इस्राईल के मुक़ाबले में प्रतिरोध का जब मुक़ाबला नहीं कर सका तो उसने यह रास्ता अपनाया ताकि इस्राईल के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए लेबनान पर दबाव डाल सके लेकिन यहां पर कहना चाहिए कि अमरीका ने लेबनान और लेबनानी राष्ट्र को अच्छी तरह से पहचाना नहीं है।