3 जुलाई 2020 - 14:41
अमरीका व ईरान क्या किसी समझौते पर पहुंच सकते हैं? ट्रम्प सरकार की गलतियां गिनायी अमरीकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स ने ... पूर्व अमरीकी विदेश सचिव ने खोली पोल

अमरीकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में अमरीका के पूर्व विदेश सचिव पुनीत तलवार का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने अमरीका व ईरान के संबंधों का तथ्यात्मक जायज़ा पेश किया है।

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा के सत्ताकाल में अमरीका के विदेश सचिव रहे पुनीत तलवार फॉरेन अफेयर्स  में लिखते हैं कि वाशिंग्टन और तेहरान दोनों ही यह समझते हैं कि वह विजयी हैं और समीकरण के लिए यह बहुत गलत सिद्धान्त है।

     दुनिया में कोरोना के फैलाव से ठीक पहले यह लग रहा था कि ईरान और अमरीका में टकराव हो जाएगा लेकिन फिर कोरोना आ गया मगर अब जहां कोरोना पूरी दुनिया में फिर से फैल रहा है वहीं, अमरीका व ईरान के बीच टकराव की आशंका भी बढ़ रही है और दोनों देशों के बीच कूटनयिक समाधान की उम्मीद खत्म होती जा रही है। दोनों देशों के भीतर जो हालात हैं उनकी वजह से तनाव में वृद्धि की आशंका है।

     ट्रम्प सरकार दो साल पहले ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से निकल गयी और उसने ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की नीति पर काम शुरु किया लेकिन इस पूरे फैसला का आधार ही गललत था। ट्रम्प को लगा था कि ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध से ईरान को वार्ता की मेज़ पर आने पर मजबूर किया जा सकता है और वार्ता की मेज़ पर अमरीका ईरान से कई प्रकार की विशिष्टता लेने में सफल हो जाएगा। ट्रम्प को लगता था कि इस तरह से वह इलाक़े में ईरान की आक्रामक नीतियों की धार मोड़ देंगे लेकिन ट्रम्प की यह रणनीति बुरी तरह से विफल हो गयी। यही नहीं इसका उल्टा असर हुआ और ईरान, अधिकतम दबाव के सामने अधिकतम प्रतिरोध की नीति पर चलने लगा। इस तरह से ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को व्यापक किया और परमाणु हथियार बनाने के लिए ज़रूरी समय को एक साल के बजाए तीन महीने तक का कर दिया।

  ईरान ने इलाक़े में तेल के प्रतिष्ठानों पर हमला किया और तेल के बाज़ार में उथल पुथल मचा दी। दूसरी तरफ ईरान ने अमरीका के एक ड्रोन विमान को मार गिराया और ईरान के समर्थक छापामारों ने इराक़ में में तैनात अमरीकी सैनिकों पर मिसाइल हमले किये। अमरीका ने भी जनरल सुलैमानी को निशाना बनाया तो ईरान ने भी इराक़ में अमरीकी छावनी पर मिसाइल बरसा कर ट्रम्प के इस क़दम का जवाब दिया।

     कुल मिला कर अमरीका व ईरान के बीच तनाव बढ़ा और ट्रम्प अकेले हो गये। अमरीका  पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा ईरान पर दबाव डालने के लिए विशाल गठबंधन बनाने में सफल हुए थे लेकिन ट्रम्प अकेले पड़ गये हैं। आज युरोप में अमरीका  निकटतम सहयोगी भी वाशिंग्टन की नीतियों का खुल कर विरोध कर रहे है।

      आगे चल कर ट्रम्प ने विवादस्पद कानून का हवाला देकर ईरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का प्रयास आरंभ कर दिया जो अक्तूबर में खत्म हो रहे हैं। युरोप के बहुत से देश इस मामले में ट्रम्प का तर्क स्वीकार नहीं कर रहे हैं लेकिन उन्होंने धमकी दी है कि ईरान के खिलाफ अगर उनका प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो वह अकेले ही आगे बढ़ जाएंगे और ट्रेगर मैकेनिज़्म को सक्रिय कर देंगे। अस्ल में चूंकि ट्रम्प सन 2015 में हुए परमाणु समझौते से सन 2018 में निकल चुके हैं इस लिए अब इस समझौते के बारे में उनका कोई तर्क अन्य पक्ष नहीं मानेंगे।

 

दूरी की वजह ? 

            सच्चाई यह है कि वाशिंग्टन और तेहरान के एक दूसरे से चालीस वर्षों से संबंध नहीं हैं इस लिए दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से नहीं जानते इसी लिए धीरे धीरे दोनों पक्ष टकराव की दिशा में बढ़ रहे हैं। ट्रम्प सरकार को लगता है कि उसने ईरान को घेर लिया है और उसकी अर्थ व्यवस्था को मुश्किल में डाल दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान के बारे में आईएमएफ के आंकड़े ही सब कुछ नही हैं हो सकता है इससे ईरान की आम जनता को कोई नुकसान भी पहुंचें मगर ईरान में शक्ति के केन्द्र बड़ी तेज़ी से स्वंय को मज़बूत कर रहे हैं।

  इन सब तथ्यों के मद्दे नज़र यह लगता है कि ट्रम्प सरकार को यह अदांज़ा नहीं था कि परमाणु समझौते से निकलने के बाद ईरान के साथ वार्ता करना इतना कठिन होगा। सच्चाई यह है कि ईरान में दक्षिणपंथी धड़े की दुश्मनी, ट्रम्प के समझौते से निकलने के बाद अधिक बढ़ गयी है। दूसरी तरह यह समझना चाहिए कि उत्तरी कोरिया के विपरीत, अमरीका से वार्ता, ईरान अपने लिए इनाम नहीं समझता । ईरान में क्रांतिकारी सरकार है जिसके लिए अमरीका का विरोध एक बुनियादी सिद्धान्त है।

     हालिया दिनों में ट्रम्प ने मांग की है कि ईरान नंवबर में राष्ट्रपति चुनाव से पहले उनके एक बेहतर समझौता कर ले लेकिन तेहरान को लगता है कि उसकी नीतियां सफल रही हैं इस  लिए वह ट्रम्प के दृष्टिगत समझौते का विरोध कर रहा है।

     सच्चाई यह है कि ट्रम्प सरकार ईरान के परमाणु विकास को रोकने लिए प्रभावशाली रणनीति नहीं रखती। इसी  तरह हालांकि प्रतिबंधों से ईरान निर्धन हुआ है लेकिन इससे इलाक़े में अपेक्षाकृत कम खर्चे वाले  क़दमों में उसकी दिलचस्पी भी बढ़ी है। इस लिए यह कहा जा सकता है कि अमरीका व ईरान, टकराव के बिन्दु की ओर बढ़ रहे हैं।

 

क्या कोई रास्ता है?

सवाल यह है कि अमरीका और ईरान के लिए वर्तमार स्थिति से निकलने का कोई रास्ता बचा है ? तो इसका जवाब है कि हां रास्ता है लेकिन उसके लिए शर्त यह है कि अमरीका अपनी विफल नीतियों से दूर हो जाए।

  सन 2012 और 2013 में मैंने ईरान के साथ खुफिया बात चीत में केन्द्रीय भूमिका निभाई है जिसका परिणाम यह निकला कि ईरान प्रतिबंधों मे कमी के मुकाबले में अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर तैयार हो गया और इस सहमति से सन 2015 में होने वाले समझौते की भूमिका तैयार हुई  इस आघार पर उस समय भी आज की ही तरह, दबाव, हमारा एक हथकंडा था लेकिन इसके साथ वार्ता की सफलता में दो चीज़ों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जो आज नहीं हैं। पहला तो यह था कि हमने सच्चाई पर आधारित एक कूटनैतिक सुझाव भी तेहरान को दिया था। हम इस बात पर ध्यान दे रहे थे कि अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। दूसरी चीज़ यह थी कि दुनिया की बड़ी शक्तियां ईरान के मामले में अमरीका का साथ दे रही थीं।

 अब जब तक अमरीकी प्रतिबंध बाकी रहेंगे ईरान, अमरीका से बात चीत पर तैयार नहीं होगा। इस लिए अब बस यही एक रास्ता बचा है कि हम किसी मध्यस्थ की मदद लें। फ्रांस के राष्ट्रपति ने पिछले साल इस संदर्भ में कुछ सफल क़दम उठाए थे। जापान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने भी मध्यस्थता की कोशिश की थी। आज भी ट्रम्प इन मध्यस्थों की मदद ले सकते हैं। एक ऐसा समझौता हो सकता है जिसके तहत ईरान, अपना परमाणु कार्यक्रम पीछे ले जाए, अमरीकी सैनिकों और उसके मित्रों पर हमले बंद कराए और उसके बदले में उस पर प्रतिबंध सीमित कर दिये जाएं।