यहां हमारे देखने और सुनने वालों के दिमाग़ में कुछ सवाल उठ सकते हैः पहला तो यह कि संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपीय संघ और बाक़ी दुनिया के कड़े विरोध के बावजूद, नेतनयाहू वेस्ट बैंक और जॉर्डन वैली का इस्राईल में विलय क्यों करना चाहते हैं? दूसरे यह कि ज़ायोनी सरकार पहली जुलाई को ऐसा क्यों नहीं कर सकी? तीसरा यह कि इस क़दम का क्या परिणाम निकल सकता है?
हम बहुत ही संक्षेप में इन तीन सवालों के जवाब देने की कोशिश करेंगे। फ़िलिस्तीनी सरज़मीन पर 1948 में अवैध रूप से वजूद में आने वाले इस्राईल ने 1967 में 6 दिवसीय अरब-इस्राईल युद्ध के दौरान बचे-खुचे फ़िलिस्तीनी इलाक़ों वेस्ट बैंक और ग़ज्ज़ा पट्टी पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। इस्राईल ने हिंसा का सहारा लेकर बहुत ही सुनियोजित ढंग से इन इलाक़ों से फ़िलिस्तीनियों को निकालना शुरू कर दिया। 20 साल बाद, फ़िलिस्तीनियों ने इस्राईली अत्याचारों के ख़िलाफ़ व्यापक आंदोलन शुरू किया, जिसे पहला इंतेफ़ाज़ा कहा जाता है। पहला इंतेफ़ाज़ा कई वर्षों तक जारी रहा, 1993 में अमरीका की मध्यस्थता में पीएलओ और इस्राईल के बीच ओसलो समझौते तक यह आंदोलन जारी रहा। ओसलो समझौते के तहत वेस्ट बैंक के इलाक़े को, कि जिसका क्षेत्रफल 5,655 वर्ग किलोमीटर है, तीन क्षेत्रों ए, बी और सी में बांट दिया गया। ए इलाक़े पर कि जो कुल वेस्ट बैंक का क़रीब 18 फ़ीसद है, नई वजूद में आने वाली फ़िलिस्तीनी अथार्टी को सीमित अधिकार दे दिए गए, बी और सी इलाक़ा पूरी तरह से तेल-अवीव के अधिकार में ही रहा। हालांकि ओसलो समझौते के तहत धीरे धीरे इन दो इलाक़ों को भी फ़िलिस्तीनी अथार्टी के अधिकार में दिया जाना था, लेकिन बी और सी इलाक़े में इस्राईल ने क़रीब 250 ग़ैर क़ानूनी बस्तियों का निर्माण कर लिया, जिनमें लगभग साढ़े पांच लाख ज़ायोनी रहते हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की तथाकथित डील ऑफ़ द सेंचरी के तहत नेतनयाहू सी इलाक़े के 30 फ़ीसद भाग का इस्राईल में विलय करने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्वी येरूशलम भी वेस्ट बैंक के सी इलाक़े में स्थित है। दूसरी ओर जॉर्डन वैली क़रीब 100 किलोमीटर लम्बी एक पट्टी है, जिसकी ज़मीन काफ़ी उपजाऊ है और रणनीतिक दृष्टि से इसका काफ़ी महत्व है। इसलिए कि यह जॉर्डन की पश्चिमी सीमा पर वेस्ट बैंक से लगी हुई है। नेतनयाहू इस इलाक़े का विलय करके भविष्य के किसी भी स्वतंत्र फ़िलिस्तीन देश की सीमा को जॉर्डन की सीमा से काटना चाहता हैं, ताकि फ़िलिस्तीनियों का किसी भी मुस्लिम अरब देश से सीधा ज़मीनी संपर्क नहीं हो सके।
नेतनयाहू की भरपूर कोशिश है कि अमरीका में नवम्बर में आयोजित होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले इन फ़िलिस्तीनी इलाक़ों का इस्राईल में विलय कर लें, क्योंकि अगर ट्रम्प चुनाव हार जाते हैं, जैसी संभावना भी है, तो आने वाली सरकार तेल-अवीव के इस क़दम का समर्थन नहीं करेगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेतनयाहू के इस क़दम के व्यापक विरोध के बाद, ट्रम्प प्रशासन भी ठंडा पड़ गया है और वह भी इस समय को इस क़दम के लिए उचित नहीं समझ रहा है। दूसरी ओर नेतनयाहू की खिचड़ी सरकार में भी पहली जुलाई की तारीख़ को लेकर मतभेद उभर कर सामने आए थे और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी सहयोगी बेनी गैंट्ज़ ने एलान कर दिया कि पहली जुलाई कोई पवित्र तारीख़ नहीं है। इन कारणों से नेतनयाहू सरकार को अपने क़दम पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
लेकिन इस सवाल का जवाब कि वेस्ट बैंक और जॉर्डन वैली के इस्राईल में विलय का परिणाम क्या होगा? यह है कि अगर तेल-अवीव ने इतनी बड़ी भयानक ग़लती की तो इस्राईल के विनाश के दिन और कम हो जायेंगे। अमरीका और इस्राईल ने 1990 के दशक में क्षेत्र में तथाकथित शांति के बहाने एक बड़ी साज़िश की और फ़िलिस्तीनियों को आपस में बांटने और उनके सशस्त्र आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए उन्हें शांति का प्रस्ताव दिया। फ़तह संगठन के नेता यासिर अरफ़ात जैसे फ़िलिस्तीन के कुछ नेता इस्राईल और अमरीका के झांसे में आ गए और उन्होंने प्रतिरोध का रास्ता छोड़कर इस्राईल के साथ शांति और सहयोग का रास्ता अपना लिया। जबकि हमसा जैसे दूसरे फ़िलिस्तीनी संगठन आज भी प्रतिरोध के ज़रिए अपने अधिकार छीन लेने में विश्वास रखते हैं। लेकिन वेस्ट बैंक का अगर इस्राईल में विलय होता है तो उन फ़िलिस्तीनियों को बड़ा झटका लगेगा, जिन्हें यह गुमान होने लगा था कि बातचीत के ज़रिए शांति की स्थापना हो सकती है और उन्हें उनके कुछ सीमित अधिकार मिल सकते हैं। वेस्ट बैंक भी फिर ग़ज्ज़ा के रास्ते पर चल पड़ेगा और पूरे इलाक़े में इस्राईल के ख़िलाफ़ एक नया और व्यापक प्रतिरोध जन्म लेगा। इस बीच, जॉर्डन भी इस्राईल को खुली धमकी दे चुका है कि अगर उसने ऐसा किया तो क्षेत्र में एक बड़े टकराव को टालना असंभव हो जाएगा।
ऐसी स्थिति में फ़िलिस्तीन के पड़ोसी देशों में प्रतिरोधी शक्तियों को आर-पार की लड़ाई का एक अच्छा मौक़ा हाथ लग जाएगा, पहले से ही जिनके लाखों मिसाइलों का रुख़ इस्राईल की ओर है। इसलिए ज़ायोनी शासन की यह ग़लती उसके ताबूत में आख़िरी कील साबित होगी और उसका अवैध वजूद हमेशा के लिए मिट जाएगा।