हालांकि अमरीका ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ाने की सिर तोड़ कोशिश कर रहा है और इसी परिप्रेक्ष्य में अमरीका के उप विदेश मंत्री की इमारात व सऊदी अरब की यात्रा अप्रत्याशित नहीं थी लेकिन विचार योग्य ज़रूर है। यह दौरा इस दृष्टि से अप्रत्याशित नहीं है कि ब्रायन हुक ईरान के ख़िलाफ़ अपने देश की नई चाल को व्यवहारिक बनाने के लिए "प्यादों" की खोज में हैं और इसके लिए सऊदी अरब के पूर्व विदेश मंत्री आदिल अलजुबैर और इमारात के विदेश मंत्री अनवर क़रक़ाश से बेहतर कौन हो सकता है जो ईरान की दुश्मनी में मशहूर हैं लेकिन यह दौरा इस लिहाज़ से विचार योग्य है कि हुक भी और जुबैर व शैख़ अब्दुल्लाह बिन ज़ायद भी यह बात बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के हिसाब से जहां इस चाल का कोई नतीजा नहीं निकलेगा वहीं इससे ईरान से दुश्मनी की अमरीका की समस्याएं भी हल नहीं होंगी और इसमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात की कोई क़ानूनी पोज़ीशन है ही नहीं। इस लिए इस मामले में इन दोनों देशों को साथ मिलना का एकमात्र लक्ष्य हंगामा मचाने और गला फाड़ने के लिए साथी इकट्ठा करना है।
सऊदी अरब में आदिल अलजुबैर के साथ हुक की बैठक ऐसी स्थिति में हुई कि जब सऊदी विदेश मंत्री एकांतवास में है जिन्हें अपने देश की विदेश नीति के निर्धारण में भूमिका निभानी चाहिए। इस बैठक में जुबैर ने इस बात को साबित करने की हर संभव कोशिश की कि यमन का अंसारुल्लाह संगठन, ईरानी हथियारों से सऊदी अरब पर हमले कर रहा है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब हाल ही में अमरीका व संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने इस बात की कोशिश की कि सऊदी अरब के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होने वाले यमनी बलों के हथियारों को ईरानी दर्शाएं। इन दोनों बातों को एक साथ रखने से यही बात सामने आती है कि ईरानी के ख़िलाफ़ हथियारों के संबंध में आरोप लगाने में इन तीनों देशों के पास वास्तव में कुछ भी नहीं है।
हुक की सऊदी व इमारात की यात्रा के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ में सऊदी अरब के प्रतिनिधि अब्दुल्लाह अलमुअल्लेमी ने भी कथित ईरानी ख़तरों का हवाला देते हुए कोशिश कि एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन में ईरान के ख़िलाफ़ निराधार दावों की कड़ी को पूरा कर दिया जाए।
विदेश सचिव के पद से हटाए गए आदिल अलजुबैर के बयान में एक ध्यान योग्य बिंदु यह था कि उन्होंने सऊदी नागरिकों के ख़िलाफ़ अंसारुल्लाह के 1659 हमलों का उल्लेख करके ईरान पर लगे हथियार संबंध प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ाने की अमरीका की मांग को मज़बूत बनाने की कोशिश की। यह ऐसी हालत में है कि पिछले छः साल से जारी युद्ध में अंसारुल्लाह ने हमलावरों के ठिकानों को निशाना बनाया है, सऊदी अरब के नागरिकों को नहीं। इसके अलावा अंसारुल्लाह ने जिन 300 लक्ष्यों को ठिकाना बनाने की बात कही है उनमें तेल प्रतिष्ठान और अहम सैन्य ठिकाने हैं। मज़े की बात यह है कि अंसारुल्लाह की सभी कार्यवाहियों के दौरान सऊदी अरब की ओर से यही घोषणा होती रही है कि उसने इन हमलों को विफल बना दिया है। एक दूसरा अहम बिंदु यह भी है कि अलजुबैर ने सऊदी अरब और उसके नेतृत्व वाले सैन्य गठजोड़ की ओर से यमन के घरों, अस्पतालों, स्कूलों, पार्कों, मस्जिदों, पेट्रोल पम्पों और नागरिक केंद्रों पर किए गए दसियों हज़ार हमलों की तरफ़ कोई इशारा नहीं किया जिनमें हज़ारों नागरिक मारे जा चुके हैं।
हुक ने हमेशा कहा है कि उनका देश इस बात की कभी भी अनुमति नहीं देगा कि सऊदी अरब की सीमाओं के क़रीब, लेबनान के हिज़्बुल्लहा संगठन जैसा कोई संगठन बने। अमरीका इसमें कितना कामयाब रहा है, यह दुनिया के सामने है। बहरहाल जो बात निश्चित है, वह यह है कि क्षेत्र में अमरीका की "दुधारू गाएं" अब भी इस बात के लिए पूरी तरह से तैयार हैं कि जिस तरह से भी संभव हो, अमरीका की सेवा करती हैं और उसके साथ मिल कर तलवार का नाच करती रहें, चाहे उसका कोई फ़ायदा न हो।