10 जून 2020 - 14:05
जिस महान फ़तह की क़ुरान ने भविष्यवाणी की थी, मिस्री दारुल इफ़्ता ने बताया सैन्य चढ़ाई, व्यापक आलोचना के बाद बदला बयान

मिस्र के दारुल इफ़्ता के एक विवादित बयान से अंकारा और क़ाहिरा के रिश्तों में पहले से जारी तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है।

क़ाहिरा स्थित दारुल इफ़्ता ने कहा है कि सन् 1453 में उस्मानी ख़लीफ़ा मोहम्मद द्वितीय के हाथों कांस्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) पर आक्रमण कोई फ़तह नहीं, बल्कि क़ब्ज़ा था।

रविवार को यह बयान दारुल इफ़्ता के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज पर जारी किया गया था, जिसमें तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान को निशाना बनाना मक़सद था।

अर्दोगान के विरोधी ख़ास तौर पर मिस्र, सऊदी अरब और यूएई के शासक उनपर अपनी औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए धर्म के इस्तेमाल का आरोप लगाते रहे हैं।

मिस्र में आधिकारिक रूप से फ़तवा जारी करने वाली संस्था ने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखाः सन् 537 में बीज़ान्टीन शासनकाल में हाया सोफ़िया इमारत का निर्माण एक चर्च के रूप में किया गया था, और 916 साल तक उसका यही स्वरूप बाक़ी रहा, जबतक कि 1453 में उस्मानियों ने कांस्टेंटिनोपल पर क़ब्ज़ा करके इस इमारत को मस्जिद में नहीं बदल दिया।

हालांकि सोशल मीडिया पर इस बयान की जमकर आलोचना के बाद, दारुल इफ़्ता अपने इस बयान में बदलाव के लिए मजबूर हो गया और उसने अपने दूसरे बयान में कहाः हम दस्तावेज़ों की बुनियाद पर बार-बार यह बात कह चुके हैं कि तुर्क राष्ट्रपति रजब तैय्यब अर्दोगान देश में अपनी तानाशाही की जड़ें मज़बूत करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं और कथित ख़िलाफ़त के नाम पर देश के बाहर अपनी महत्वाकांक्षाओं को सही ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। जहां तक कांस्टेंटिनोपल की फ़तह का ताल्लुक़ है, वह एक महान इस्लामी फ़तह थी, जिसकी भविष्यवाणी क़ुरान और अंतिम ईश्वरीय दूत ने की थी, जिसे महान उस्मानी सूफ़ी सुल्तान मोहम्मद अल-फ़ातेह ने अंजाम दिया था, जिन्हें सुल्तान मोहम्मद द्वितीय कहा जाता है।

बयान में आगे ज़ोर देकर कहा गयाः लेकिन अर्दोगान मोहम्मद अल-फ़ातेह नहीं हैं और न ही उनका उनसे कोई संबंध है।

तुर्की में धार्मिक मामलों के प्रमुख अली इरबस ने मिस्री दारुल इफ़्ता के इस बयान को अफ़सोसनाक और बुरा बताया है।

पिछले साल तुर्क राष्ट्रपति ने हाया सोफ़िया इमारत संग्राहलय को फिर से मस्जिद में बदलने का संकल्प ज़ाहिर किया था।

यह कोई पहली बार नहीं है कि मिस्र ने अर्दोगान पर उस्मानिया साम्राज्य के उपनिवेश रहे अरब देशों पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए धर्म के इस्तेमाल का आरोप लगाया हो।

फ़रवरी में दारुल इफ़्ता ने कहा था कि तुर्क राष्ट्रपति और उनके अनुयायी अपने सैन्य अभियानों पर पर्दा डालने के लिए धर्म और फ़तवों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

मिस्री सेना ने 2013 में तुर्की समर्थित मोहम्मद मोर्सी के नेतृत्व में देश की पहली निर्वाचित सरकार का तख़्तापलट दिया था, जिसके बाद सत्ता पर पूर्व सेना प्रमुख व वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सीसी ने क़ब्ज़ा कर लिया था। उसके बाद से ही दोनों देशों के संबंध ख़राब हो गए।

उस समय तुर्क राष्ट्रपति अर्दोगान ने कहा था कि वे अल-सीसी जैसे शख़्स से बात नहीं करेंगे और मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को जेलों से रिहा करने की मांग की थी।

ग़ौरतलब है कि अर्दोगान ख़ुद भी मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा से जुड़े हुए हैं, जिसे मिस्र की सरकार अपने लिए सबसे गंभीर ख़तरा समझती रही है और उसने इस संगठन के दर्जनों अधिकारियों को फांसी पर लटका दिया है और हज़ारों कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया है।