3 जून 2020 - 17:06
ईरानी अर्थ व्यवस्था को तेल से कैसे अलग करें? इमाम खुमैनी की बरसी पर वरिष्ठ नेता के भाषण का विश्लेषण

इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक इमाम खुमैनी की बरसी के अवसर पर वरिष्ठ नेता आतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने अपने भाषण में कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है जिनमें एक महत्वपूर्ण बिन्दु ईरान की अर्थ व्यवस्था को तेल से अलग करना है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने लगभग 17 साल पहले देश के अधिकारियों से एक भेंट में कहा था कि " आज इलाक़े के देशों के पास जो तेल है अगर वह युरोपीय देशों के पास होता और वह आप ईरानियों या तेल रखने वाले अन्य देशों को बेचते तो हर गिलास तेल के लिए वह आपकी जान निकाल लेते लेकिन अब वह दसियों लाख बैरल तेल बेहद सस्ते दामों में खरीद रहे हैं और इतना तेल लेकर जो क़ीमत देते हैं वह न देने के बराबर है। "

    वरिष्ठ नेता का यह बयान, तेल और गैस के मूल्य को दर्शाता है जो वर्षों से लगभग मुफ्त में ही कच्चे माल के रूप में बेचा जा रहा है।

    वास्तव में अगर ईरान अपने बजट से तेल की आमदनी को खत्म करने में सफल हो जाता है और फिर दूसरे चरण में कच्चे तेल के बजाए उसके उत्पाद बेचने की दिशा में बढ़ता है तो फिर वह सही रूप से अपने प्राकृतिक संसाधनों को देश के विकास के लिए प्रयोग कर सकता है।

    इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इमाम खुमैनी की बरसी के अवसर पर अपने भाषण में बल देकर कहा कि " अर्थ व्यवस्था में क्रांति यह है कि देश की अर्थ व्यवस्था को तेल पर निर्भरता से दूर कर दिया जाए।"

वास्तव में तेल की आमदनी, ईरान की अर्थ व्यवस्था के लिए एक रोग बन चुकी है। अगर जैसा कि वरिष्ठ नेता ने कहा है कि यह निर्भरता खत्म कर दी जाती तो देश के विकास की तरफ यह सब से बड़ा क़दम होता क्योंकि  उस दशा में सरकारें, आसानी से हाथ आने वाली तेल की आदमनी पर भरोसा नहीं करतीं और आदमनी के अन्य रास्ते खोजतीं।  

    तेल से समृद्ध देशों पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि वह दो भागों में बंटे हुए हैं एक में नार्वे जैसे देश हैं और दूसरे में ईरान जैसे देश हैं। यह अंतर, इन देशों की सरकारों में तेल के बारे मे राय की वजह से है। तेल और तेल की आमदनी खुद कोई बुरी चीज़ नहीं है लेकिन अगर उसकी आदमनी से लाभ उठाने की व्यापक योजना न हो तो फिर ईरान जैसे देशों को उसका काफी नुक़सान उठाना पड़ता है। डच डिसीज़ कही जाने वाली यह बीमारी सन 1974 से ईरान में फैली और चूंकि तेल की आमदनी से आयात होने वाले सामानों का घरेलू उत्पाद मुकाबला नहीं कर पाए इस लिए देश की अर्थ व्यवस्था तबाह हो गयी।

    इस बीमारी से मुकाबले के कई रास्ते में जिनमें से एक विदेशी मुद्रा कोष का गठन है जो किया जा चुका है और अब उस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

    इसके अलावा ईरान अगर तेल पर निर्भरता से बचना चाहता है तो उसे अपने कृषि क्षेत्र को मज़बूत करना होगा।

    ईरान में सरकार के बजट का 45 प्रतिशत से अधिक भाग तेल की आमदनी से पूरा होता है जिससे  साफ पता चलता है कि ईरान की अर्थ व्यवस्था किस तरह से तेल पर निर्भर है।

    ईरान में अर्थ व्यवस्था की विभिन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए वरिष्ठ  नेता ने प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था का रास्ता अपनाने का सुझाव दिया जो निश्चित रूप से ईरान को आत्म निर्भर बना सकती है। रोचक बात है कि पश्चिमी देश अपने उत्पादों को अपना हथियार बना कर पूरी दुनिया पर दबाव डालते हैं लेकिन तेल के मामले में वह तेल को हथियार बना कर उन देशो  पर दबाव डालते हैं जिनके वहां तेल पैदा होता है?

    अमरीका जैसे देश तेल को सस्ता करके तेल उत्पादक देशों पर दबाव बनाते हैं और जब किसी वजह से तेल महंगा हो जाता है तो फिर यही देश उत्पादक देशों को मजबूर करते हैं कि वह अपना उत्पादन बढ़ा कर तेल का मूल्य नीचे लाएं।

    तेल का पूरा खेल अमरीका और पश्चिमी देशों के हाथ में है और जिन देशों में तेल पैदा होता है उन की भूमिका इस खेल मे शून्य है। ईरान ने इसी प्रकार की बहुत सी समस्याओं की वजह  से तेल से मुक्त अर्थ व्यवस्था की तरफ क़दम बढ़ाया है और अन्य क्षेत्रों की तरह उसे निश्चित रूप से इस क्षेत्र में भी सफलता मिलेगी।