24 मई 2020 - 12:21
ट्रम्प के हिस्से में शोर शराबा फ़सल काट रहे हैं चीनी राष्ट्रपति, कैसे डालर का पत्ता साफ़ कर रही है चीनी करेंसी? कोरोना की परीक्ष

अमरीका के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन दिनों कोरोना वायरस की महामारी और अमरीकी अर्थ व्यवस्था पर उसके विनाशकारी प्रभाव की नहीं हैं बल्कि इससे भी बड़ी चुनौती और इससे ज़्यादा भयानक वायरस अमरीका के सामने है और उसका नाम है चीन।

क्योंकि अमरीका की सुपर पावर वाली हैसियत अब ख़तरे में पड़ गई है और अमरीकी डालर जो पिछले 75 साल से विश्व अर्थ व्यवस्था पर एकछत्र राज का स्वामी था अब कई एजेंडों की ज़द में आ गया है जो बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

यह सही है कि अमरीका में अब तक 16 लाख से अधिक लोग कोरोना से संक्रमित हो गए और लगभग 1 लाख लोगों की जानें जा चुकी हैं लेकिन अमरीका के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन और चीनी करेंसी डिजिटल युवान की ओर से आ रही है। चीन के चार प्रांतों में डिजिटल करेंसी का प्रयोग शुरू हो चुका है और इसे राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय करेंसी के तौर पर पूरी दुनिया में चलाने की तैयारी भी पूरी कर ली गई है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आर्टिफ़िशियल इंटैलीजेन्स और पांचवीं पीढ़ी की तकनीक को अपने एजेंडे के केन्द्र में रखकर विश्व व्यापी योजनाएं बनाईं और अब उसकी फ़सल काट रहे हैं। चीन की नई डिजिटल करेंसी आरएमबी का महत्व दो बुनियादी वजहों से है। एक तो यह कि भविष्य में अमरीका का कोई भी प्रतिबंध उस पर कोई असर नहीं डाल पाएगा और दूसरी वजह यह कि इससे चीन को बहुत अधिक जियो पोलिटिकल महत्व मिल जाएगा क्योंकि चीन की अली बाबा और दूसरी सैकड़ों कंपनियां अब अफ़्रीक़ा और लैटिन अमेरिका में बहुत तेज़ी से फैलती जा रही हैं। चीन ने डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल इतना बढ़ा दिया है कि ब्लूमबर्ग मैगज़ीन के अनुसार वर्ष 2018 में चीन में लगभग साढ़े 41 ट्रिलियन डालर का लेनदेन मोबाइल फ़ोन से हुआ।

चीन सबसे पहले कोरोना वायरस की चपेट में आया और बहुत तेज़ी से इस महामारी के चंगुल से बाहर भी निकल गया। अमरीका, ब्रिटेन, इटली और फ़्रांस को तो इस वायरस ने ध्वस्त करके रख दिया।

चीन की अर्थ व्यवस्था कोरोना वायरस के गंभीर वार के बाद बहुत तेज़ी से उबर रही है। इस समय 177 तेल टैंकर चीनी तट की ओर से बढ़ रहे हैं और ईंधन की खेप वहां ख़ाली करने वाले हैं, यानी चीनी इकानोमी रफ़तार पकड़ चुकी है। चीन यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बहुत तेज़ी से ख़रीदता जा रहा है क्योंकि कोरोना की वजह से इन कंपनियों के शेयरों की क़ीमत बहुत गिर गई है। यहां तक कहा जा रहा है कि चीन बड़ी ख़ामोशी से आधी दुनिया ख़रीद रहा है।

कोरोना वायरस ने जहां बहुत से नेताओं की असमर्थता पर पड़ा पर्दा हटा दिया है वहीं कुछ नेताओं ने अपने कौशल का लोहा भी मनवाया है। चीन ने जहां आर्थिक मंच पर बाज़ी मारी है वहीं विशेषज्ञ कहते हैं कि अमरीकी अर्थ व्यवस्था को संभलने में अब कई दशकों का समय लग जाएगा।

जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल कोरोना के इम्तेहान में कामयाब रहीं और उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ बहुत बढ़ गया है। पांचवीं बार देश की नेता के रूप में उनका चयन यक़ीनी बन गया है। इस इम्तेहान में ट्रम्प और उनके ब्रितानी चेले बोरिस जानसन बुरी तरह फ़ेल हुए हैं। यही बात फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां के बारे में भी कही जा रही है। फ़ेल होने वालों की यह सूची बहुत लंबी है।

हो सकता है कि चीन तुरंत डालर का प्रभुत्व समाप्त न कर सके लेकिन उसने डालर को कमज़ोर करना शुरू कर दिया है। पांच साल से ज़्यादा समय नहीं लगेगा कि डालर का वर्चस्व ध्वस्त हो जाएगा। अमरीका आए दिन अलग अलग देशों और कंपनियों पर जो प्रतिबंध लगा रहा है उसका भी डालर की पोज़ीशन कमज़ोर करने में बड़ा असर रहा है।

हम यह बात मानते हैं कि अमरीका से हमें किसी तरह की हमदर्दी नहीं है क्योंकि हम अरबों और मुसलमानों की अधिकतर विडंबनाओं के पीछे अमरीकी राजनेताओं का ही हाथ रहा है लेकिन यहां हम जो कुछ लिख रहे हैं वह कामनाएं नहीं बल्कि ज़मीनी सच्चाई है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार