बिहार के एक सरकारी अस्पताल में एक बच्ची को सांसों की डोर बंधी रहने के लिए ख़ून की बहुत ज़रूरत थी। इसकी ख़बर जब एक मुस्लिम युवक को हुई तो उसने रोज़ा होने के बावजूद, ठीक इफ़्तार के वक़्त अस्पताल पहुंचकर रक्तदान किया और इस तरह से एक इंसान की मूल्यवान जान बचाकर अपना रोज़ा इफ़्तार किया, ताकि नफ़रत भरे माहौल में इंसानियत ज़िंदा रहे।
प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, उज्जवल सिंह की 3 वर्षीय बेटी निशा कुमारी थैलेसीमिया नामक बीमारी से पीड़ित है, जिसमें शरीर में असामान्य रूप से ख़ून या हीमोग्लोबिन मात्रा बहुत कम हो जाती है।
डॉक्टरों ने जब देखा कि बच्ची की हालत बहुत ख़राब है, तो उन्होंने बच्ची के मां-बाप से तुरंत ख़ून का इंतज़ाम करने के लिए कहा। सिंह स्थानीय ब्लड बैंक गए, लेकिन उन्हें वहां से निराश होकर ख़ाली हाथ लौटना पड़ा। उसके बाद उन्होंने ज़िला रक्तदान समिति से संपर्क किया, जिसने उनकी मदद करने का वादा किया। हालांकि, सिंह उनके इस वादे से आश्वस्त नहीं थे।
निराश होकर जब वे अस्पताल पहुंचे तो उन्हें यह देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि वक़ार अहमद नाम का एक युवक बेसब्री से उनकी राह देख रहा है। अहमद ने लपक कर सिंह से कहाः किसी ने मुझे बताया कि आपको अपनी बेटी के लिए तुरंत ख़ून की ज़रूरत है। मैं रक्तदान के लिए ही यहां आया हूं।
अहमद ने रोज़े की हालत में एक इंसान की जान बचाई। उनका कहना है कि इंसानों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
सिंह यह देखकर भावुक हो गए और अपने आंसुओं पर क़ाबू नहीं रख सके, जो उनकी आंखों से लगातार टपक रहे थे। उन्होंने कहाः मेरे पास अहमद का शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द नहीं हैं।
ऐसी ही एक दूसरी घटना झारखंड में घटी, जहां एक हिंदू लड़के की जान बचाने के लिए एक रोज़ेदार मुस्लिम युवक सामने आया और उसने रक्तादन करके अपना रोज़ा इफ़्तार किया।
8 वर्षीय निखिल के माता-पिता अपने बच्चे की जान बचाने के लिए काफ़ी हाथ पैर मार रहे थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से वे कहीं से ख़ून की व्यवस्था नहीं कर पा रहे थे।
निखिल का निमोनिया बिगड़ चुका था और डॉक्टर लगभग निराश हो चुके थे। आख़िर में लड़के के पिता ने अपने गांव के कुछ लोगों को संदेश भेजा। जैसे ही यह ख़बर गांव में पहुंची, सलीम अंसारी दौड़कर अस्पताल पहुंचे और उन्होंने समय बर्बाद किए बिना रक्तदान की पेशकशक की।
निखिल के मां-बाप का कहना है कि मैं एक हिंदू हूं और मेरे बेटे की रगों में अब एक हिंदू के साथ-साथ एक मुसलमान भाई का भी ख़ून वैसे ही दौड़ेगा, जैसे मेरा दौड़ता है। ख़ून का रंग तो सभी का एक है, फिर धर्म के नाम पर हम क्यों एक दूसरे का ख़ून बहाने के लिए तैयार हो जाते हैं और इंसानियत भूल जाते हैं।