15 मई 2020 - 13:52
कोरोना उद्योग बनाम दाइश उद्योग, अगर बनाने वाले को सज़ा मिलनी चाहिए तो किस किस को सज़ा मिले?

कोरोना के फैलाव के कारण चीन की ओर से पश्चिम ख़ास तौर पर अमरीका को हर्जाना देने की मांग बढ़ती जा रही है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि वे इस संबंध में कार्यवाही करने जा रहे हैं और अमरीका को जर्मनी से दुगना हर्जाना मिलना चाहिए। जर्मनी ने 165 अरब डॉलर के हर्जाने की मांग की है।

यह पहली बार है जब कोई देश अपनी भौगोलिक सीमाओं के अंदर अचानक व प्राकृतिक रूप से कोई वायरस फैलने के कारण किसी अन्य देश से हर्जाना मांग रहा है। स्पष्ट सी बात है कि यह मांग, अमरीका व चीन के बीच जारी व्यापारिक युद्ध के परिप्रेक्ष्य में की जा रही है क्योंकि इस युद्ध का पलड़ा चीन की ओर ही झुक रहा है। हालांकि अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था बल्कि सीआईए जैसी अमरीकी संस्थाओं तक ने चीन के ख़िलाफ़ ट्रम्प के दावों की पुष्टि नहीं की है, फिर भी ट्रम्प का यह कहना कि कोरोना वायरस चीन की प्रयोगशालाओं में पैदा हुआ है या कोरोना के फैलाव के संबंध में चीन ने पारदर्शिता नहीं दिखाई और सही सूचनाएं नहीं दीं, हास्यास्पद ही कहा जाएगा। अगर एक पल के लिए यह मान भी लिया जाए कि चीन इसके लिए ज़िम्मेदार है और कोरोना वायरस उसकी प्रयोगशालाओं से बाहर आया है और इसके लिए उसे अमरीकियों व अमरीकी अर्थव्यवस्था को इस वायरस से पहुंचने वाले नुक़सान की भरपाई करनी चाहिए तो फिर उस नुक़सान के बारे में अमरीका क्या कहेगा जो क्षेत्रीय राष्ट्रों को तालेबान, दाइश व अन्य आतंकी वायरसों की विध्वंसक कार्यवाहियों के कारण उठाना पड़ा है? ये ऐसे वायरस हैं जो अमरीकी प्रयोगशालाओं से बाहर आए हैं और कोरोना वायरस ने जो नुक़सान पहुंचाया है वह अमरीका द्वारा तैयार किए गए आतंकी गुटों के हाथों पहुंचाए गए नुक़सान के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं है।

 

तालेबान, दाइश व अन्य आतंकी गुटों के वायरस, कोरोना वायरस की तरह नहीं हैं कि जिन्हें अमरीका, चीन के साथ अपने व्यापारिक युद्ध में दबाव के साधान के रूप में इस्तेमाल कर सके। अमरीका के पास तो इस बात का कोई प्रमाण भी नहीं है कि इस वायरस को बनाने में चीन का हाथ है जबकि ख़ुद अमरीकी अधिकारियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि उन वायरसों को शत प्रतिशत अमरीका ने तैयार किया है जो कई देशों व राष्ट्रों में रक्तपात कर रहे हैं। इन वायरसों ने इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, यमन, लीबिया, अलजीरिया, सूमालिया, माली और कई अन्य देशों में दसियों लाख लोगों की जान ली है और घायल किया है।

 

कैसे संभव है कि वे राष्ट्र जिनके दसियों लाख लोग अमरीका के दाइशी व तालेबानी वायरसों के माध्यम से हताहत या घायल हुए हों या युद्ध से बचने के लिए पलायन करते समय समुद्र में डूब गए हों और जिनकी अर्थव्यवस्था बिखर गई हो, हर्जाना न हासिल करें? क्या इन सरकारों व राष्ट्रों के पास इतनी ताक़त है कि वे अपनी मांग, अमरीका से मनवा सकें और उससे हर्जाना ले सकें जिस तरह अमरीका, चीन से हर्जाना लेना चाहता है? क्या कोई ऐसा अंतर्राष्ट्रीय पक्ष है जो अमरीका व पश्चिम के नियंत्रय में न हो कि जिस पर हर्जाना हासिल करने के लिए भरोसा किया जा सके?

 

यह सवाल इस लिए पेश किए जा रहे हैं कि लोगों को सच्चाई का पता चले वरना सभी को पता है कि जब तक धौंस और ताक़त का राज है, तब तक इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिलेगा। इसी पाश्विक, बेलगाम और नैतिका व मावनीय मान्यताओं से दूर ताक़त ने बैतुल मुक़द्दस, पश्चिमी तट और सीरिया के गोलान को ज़ायोनी शासन को भेंट कर दिया है, यही ताक़त यमनी बच्चों की जान ले रही है, यही ताक़त इराक़ियों के विरोध के बावजूद उनके देश में सैन्य उपस्थिति जारी रखने पर अड़ी हुई है, यही ताक़त सीरिया के तेल को दिन दहाड़े लूट रही है और सऊदी अरब के ख़ज़ाने को पूरी ढिठाई के साथ ख़ाली कर रही है, यही ताक़त है जो लेबनान में हिज़्बुल्लाह समेत प्रतिरोधकर्ता बलों को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से मतभेद फैला रही है, यही ताक़त है जो ईरानी राष्ट्र के ख़िलाफ़ जो उसकी झूठी हैसियत के सामने उठ खड़ा हुआ है, प्रतिबंध लगाती है और ही ताक़त है जिसने इससे पहले भी हिरोशीमा व नागासाकी पर परमाणु बमबारी जैसे पाश्विक काम किए हैं और वियेतनाम, कोरिया, इराक़ व अफ़ग़ानिस्तान पर अवैध क़ब्ज़ा भी किया है जबकि अपने इन अपराधों पर उसने इन देशों के प्रभावितों को कोई हर्जाना नहीं दिया है, क्योंकि उसका मानना है कि वही सत्य पर है और दूसरे कमज़ोर व ग़लत हैं।