पोम्पियो ने इस्राईल की इस यात्रा में ज़ायोनी प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू और उनके प्रतिस्पर्धी बेनी गेंट्ज़ से बंद दरवाज़ों के पीछे बातचीत की। उनका यह दौरा इस्राईल के नए मंत्रीमंडल के गठन और संसद में उसके शपथ ग्रहण से एक दिन पहले हुआ। इस यात्रा को पश्चिमी तट के कुछ इलाक़ों को इस्राईल में जोड़ने की ज़ायोनी शासन की योजना को हरी झंडी दिखाने के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले नेतनयाहू और बेनी गेंट्ज़ नए मंत्रीमंडल के गठन पर सहमत हुए थे और दोनों ने तय किया है कि वे बारी बारी मंत्रीमंडल का नेतृत्व करेंगे और पश्चिमी तट की तीस प्रतिशत से ज़्यादा ज़मीन को इस्राईल से जोड़ने की योजना को आगे बढ़ाएंगे।
कुछ टीकाकारों का कहना है कि यह दौरा, वार्ता में फ़िलिस्तीनियों का समय बर्बाद करने की अमरीका की कोशिश है विशेष कर इस लिए भी कि ज़ायोनियों ने हाल ही में, फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन को इस्राईल से जोड़ने की बात करने के बजाए उन क्षेत्रों पर अपना शासन स्थापित करने की बात कहना शुरू कर दिया है। हालांकि दोनों बातों में कोई ख़ास अंतर नहीं है लेकिन यह एक राजनैतिक जाल हो सकता है। इस अर्थ में कि अवैध क़ब्ज़ा करने वाले, पश्चिमी तट और जॉर्डन की घाटी तक अपना शासन बढ़ा देंगे और उसके बाद फ़िलिस्तीनी प्रशासन को इस्राईल के अधीन आ जाने वाले इलाक़ों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए दोबारा वार्ता की मेज़ पर घसीट लाएंगे। यह चाल, सन 1981 में गोलान की घटनाओं की याद दिलाती है। उस साल ज़ायोनी शासन ने गोलान पर अपनी संप्रभुता स्थापित करने की घोषणा कर दी। सन 2019 में यही ड्रामा पश्चिमी तट के इलाक़ों के संबंध में दोहराया गया और नेतनयाहू और उनके बाद डोनल्ड ट्रम्प ने कहा कि इन इलाक़ों को इस्राईल से जोड़ा जाएगा। इन हालात में फ़िलिस्तीनी प्रशासन को इस जाल की ओर चौकन्ना रहना चाहिए और एक बार फिर निरर्थक वार्ताओं में नहीं फंसना चाहिए।
दूसरी ओर पोम्पियो का यह दौरा, वाइट हाउस में अपनी उपस्थिति की समय सीमा बढ़ाने के लिए डोनल्ड ट्रम्प के प्रचार अभियान का एक हिस्सा भी हो सकता है। ट्रम्प, जो कोरोना के संकट को नियंत्रित करने में नाकाम रहे हैं, कोशिश कर रहे हैं कि इस्राईल को ख़ुश करके और पश्चिमी तट पर उसके स्वामित्व का समर्थन करके इस नाकामी की भरपाई कर लें। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की इस्राईल यात्रा का एक मुद्दा ईरान भी था। उन्होंने नेतनयाहू से वार्ता में ईरान को दुनिया को भय व आतंकी की जड़ बताया। नेतनयाहू न भी ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए अमरीका का शुक्रिया अदा किया।
इन बातों से लगता है कि ट्रम्प अपने ज़ायोनी आक़ाओं को ख़ुश करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं ताकि उनकी कृपा से, एक बार फिर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में विजय हासिल कर सकें, जैसा कि उन्होंने पिछली बार भी ज़ायोनी लॉबी के समर्थन से वाइट हाउस में प्रवेश करने में सफलता हासिल की थी। चूंकि अपने पहले राष्ट्रपति काल के क्रियाकलाप को मद्देनज़र रखते हुए ट्रम्प को जनता की ओर से वोट मिलने की कोई ख़ास आशा नहीं है, इसी लिए उन्होंने एक बार फिर ज़ायोनी शासन से संबंधित लॉबियों के सामने हाथ फैला दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि वे सिर्फ़ उसी सूरत में राष्ट्रपति चुनाव जीत पाएंगे जब ज़ायोनी उनसे दिल से ख़ुश हों।