5 मई 2020 - 13:28
कड़े प्रतिबंधों में कैसे बनायी गयीं पनडुब्बियां? ईरानी पनडुब्बियां को जानें, एक एक क़दम परमाणु पनडुब्बी की ओर ... इस लिए अमरीका

इस्लामी गणतंत्र ईरान के नौसेना प्रमुख ने कहा है कि " बेसत" नामक पनडुब्बी की डिज़ाइनिंग आदि का काम पूरा हो चुका है और जल्द ही उसका निर्माण कार्य आरंभ हो जाएगा।

युद्ध के दौरान पनडुब्बियों के प्रयोग के आरंभ से ही एक नया अध्याय शुरु हो गया क्योंकि पनडुब्बियों में सब से बड़ी विशेषता यह होती है कि वह समुद्र के तल में छुप सकती हैं जो युद्धपोत नहीं कर सकते। गत 100 वर्षों के दौरान पनडुब्बियों के निर्माण में बहुत अधिक तरक्की हुई है और आज के आधुनिक दौर में पनडुब्बी किसी भी देश के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण हथियार हो सकता है।

बीसवीं सदी के आरंभ होते ही परमाणु ईंधन से चलने वाली नयी प्रकार की पनडुब्बियां बनायी जाने लगीं। इस प्रकार की अत्याधुनिक पनडुब्बी को कभी बाहर से ईंधन लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती इस तरह वह हमेशा समुद्र में अपने मिशन में व्यस्त रह सकती है। कर सकते। गत 100 वर्शड़ी विशेषता यह होती है कि वह समुद्र के तल में छुप सकती हैं जो युद्धपोत नहीं कर सकते। गत 100 वर्श

बैलेस्टिक मिसाइल के लैस यह पनडुब्बियों शीत युद्ध के दौरान शक्ति की प्रतीक थीं और पूर्व सोवियत संघ ने तो इसी प्रकार की एक पनडुब्बी से एक सेटेलाहट अंतरिक्ष में भी भेजा था।

इस समय दुनिया के केवल छे देशों के पास परमाणु ईंधन से चलने वाली पनडुब्बी बनाने की तकनीक है लेकिन आम पनडुब्बी, एटमी फ्यूल से चलने वाली पनडुब्बियों की तुलना में कम आवाज़ करती है और ज़्यादा आसानी से छुप सकती है।

 

ईरान में पनडुब्बी का निर्माण

ईरान में पनडुब्बी निर्माण का फैसला सद्दाम द्वारा थोपे गये युद्ध के आरंभ में किया गया लेकिन बहुत प्रयास के बाद भी कोई सफलता नहीं मिली। शीत युद्ध के खत्म होने के बाद  ईरान ने रूस से तीन पनडुब्बी खरीदी जो 90 के दशक में ईरान को दी गयी। यह " किलो" मॉडल की पनडुब्बियां थीं जिन्हें दुनिया में सब से अच्छी पनडुब्बी माना जाता है उसके बाद धीरे धीरे ईरानी इंजीनियरों का प्रयास रंग लाया और ईरान ने " तारिक़" नाम की पहली पनडुब्बी बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। इस पनडुब्बी के अधिकांश पुर्ज़ों को देश के भीतर तैयार किया गया विशेषकर उसकी बैटरी का देश में निर्माण महत्वपूर्ण था क्योंकि बैटरी ही पनडुब्बी के अभियान की समय सीमा का निर्धारण करती है। ईरान की बनायी हुई पनडुब्बी से समुद्र के तल से युद्धपोत भेदने वाली क्रूज़ मिसाइल फायर किये जा सकते हैं।

 ईरान की ज़रूरत इस प्रकार की पनडुब्बी से अधिक थी। फार्स की खाड़ी की गहरायी और हुरमुज़ स्ट्रेट की परिस्थितियों के लिहाज़ से ईरान को खास किस्म की पनडुब्बी की ज़रूरत महसूस हुई और फिर रक्षा मंत्रालय और युनिवर्सिटियों के सहयोग से परियोजना पर काम आंरभ हुआ।

 

      ईरान ने नहंग नामक पनडुब्बी के निर्माण प्राप्त अनुभवों से लाभ उठाते हुए " गदीर " नामक पनडुब्बी का निर्माण आंरभ किया और फिर उसके कई मॉडल एक के बाद एक बनाए गये। गदीर पनडुब्बी खास तौर पर फार्स की खाड़ी के लिए बनायी गयी है इस लिए वह इस समुद्र में बेहद उपयोगी है। ईरान ने इसे बनाते समय ओमान सागर के मौसम को भी नज़र में रखा है। 29 मीटर लंबी यह पनडुब्बी 115 टन बोझ उठा सकती है और जब वह समुद्र तल में होती है तो राडार उसका पता नहीं लगा सकते।

ईरान ने अपने तटवर्ती पानी में अभियान में भाग लेने वाली पनडुब्बी से अधिक की ज़रूरत महसूस की और फिर " फातेह" नाम की पनडुब्बी बनी। 593 टन की यह पनडुब्बी गदीर पनडुब्बी से कई आयामों से बहुत आधुनिक है। यह 200 मीटर की गहरायी में भी बड़ी आसानी से चलती है , 250 मीटर गहरायी तक जा सकती और 35 दिन समुद्र के भीतर रह सकती है। इस पनडुब्बी को बनाने के लिए देश के भीतर चार लाख बारह हज़ार कल पुर्ज़े तैयार किये गये  जिसके लिए विशेषज्ञों ने  42 लाख घंटे काम किया और इस पनडुब्बी को बनाने में 48 डिज़ाइनिंक कंपनियों, 120 कारखानों, 80 नॉलिज बेस्ट कंपनियों, 57 युनिवर्सिटों और 195 रिसर्च सेन्टरों ने सहयोग किया।

     गदीर के बाद कोशिश रुकी नहीं और अधिक आधुनिक और भारी पनडुब्बी निर्माण की कोशिश जारी रही जिसके परिणाम में " बेसत " नामक पनडुब्बी की योजना बनी।  बेसत 3000 टन भार उठा सकती है जिसका अर्थ यह है कि यह अधिक हथियार अपने साथ लेकर अभियान में भाग ले सकती है। ईरानी इंजीनियरों ने 30 वर्षीय अनुभव के बाद इसका डिज़ाइन तैयार किया है और इसके निर्माण की सारी तैयारी पूरी की जा चुकी है और जैसा कि नौसेना ने बताया है कि इसे जारी वर्ष में निर्माण किया जाएगा। ईरान का अगला और आखिरी क़दम, पनडुब्बी के ईंधन के लिए छोटा परमाणु रिएक्टर बनाना है। वास्तव में एक बहुत ही छोटा सा परमाणु बिजली घर तैयार किया जाता है और उसे पनडुब्बी में लगा दिया जाता है जिससे पनडुब्बी परमाणु ईंधन से चलने लगती है। ईरान इस दिशा में बढ़ रहा है। परमाणु ईंधन से चलने वाली पनडुब्बी की बहुत सी अच्छाई और बुराई है मगर से महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अधिक समय तक ईंधन लिए बिना समुद्र तल में अपना काम कर सकती है मतलब 30 साल तक वह बिना ईंधन लिए अपना काम जारी रख सकती है।

     ईरान ने यह सारी सफलताएं, अपने खिलाफ कड़े प्रतिबंधों के दौरान हासिल की हैं यही वजह है कि अब जबकि अगले कुछ महीनों में ईरान के खिलाफ हथियारों का प्रतिबंध समाप्त होने वाला है अमरीका बौखलाहट का शिकार है। अमरीका को चिंता है कि हथियारों का प्रतिबंध खत्म होने के बाद ईरान की सेना के पास अत्याधुनिक हथियार और तकनीक आ जाएगी जिससे उसके लिए काफी समस्याएं पैदा हो जाएंगी।