सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 64, 65 और 66 का अनुवादः
निश्चय ही ईश्वर ने काफ़िरों पर धिक्कार की है और उनके लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है। जिसमें वे सदैव रहेंगे, जहां उन्हें न कोई समर्थक मिलेगा और न ही कोई सहायक। जिस दिन उनके चेहरे आग में (बार बार) पलटाए जाएँगे (और) वे (निराशा से) कहेंगे कि काश हमने ईश्वर का आज्ञापालन किया होता और (काश हमने) पैग़म्बर का (भी) आज्ञापालन किया होता!
संक्षिप्त टिप्पणी:
जो लोग धार्मिक आस्थाओं को कमज़ोर बनाने और ईश्वर से लोगों के संपर्क को ढीला करने की कोशिश में रहते हैं, वे इस संसार में तो ईश्वरीय दया से वंचित होते ही हैं, परलोक में भी कड़े ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होते हैं।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
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ईश्वर के इन्कार और कुफ़्र का परिणाम, जो सत्य से दुश्मनी व द्वेष के कारण अस्तित्व में आता है, लोक-परलोक में ईश्वरीय दंड व धिक्कार के रूप में सामने आता है।
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संसार की सामाजिक व्यवस्था के विपरीत, प्रलय में कोई भी किसी की मदद नहीं कर सकता और न ही उसे दंड में ग्रस्त होने से बचा सकता है।
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लोक-परलोक में मुक्ति व मोक्ष का एकमात्र मार्ग, ईश्वर व उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन है।
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इस बात की ओर से निश्चेतना प्रलय में पछतावे का कारण बनेगी।