निसंदेह तेल की कीमत में गिरावट कई हफ्तों तक कई क्षेत्रों पर अपना प्रभाव छोड़ेगी और निश्चित रूप से यह गिरावट तेल के उद्योग को प्रभावित कर रही है और करती रहेगी यह बात अलग है कि भविष्य में कोई चमत्कार हो जाए। चमत्कार से आशय कोई बड़ा युद्ध या फिर किसी भी असाधारण वजह से तेल की कीमत अचानक ही बढ़ जाए।
अगर फार्स की खाड़ी में कोई बड़ा युद्ध या विश्व युद्ध न हो तो फिर यही अनुमान लगाया जा रहा है कि तेल की कम क़ीमत जारी रहेगी और कोरोना की वजह से विश्व भर में अर्थ व्यवस्था मे मंदी रहेगी तो फिर इस मंदी और तेल के मूल्यों में गिरावट के बाद तेल बेच कर धनी बनने वाले देशों का क्या होगा?
क्या केवल फार्स की खाड़ी के देशों को नुक़सान होगा?
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि फार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों को ही तेल की कीमत के इस संकट से नुकसान पहुंचेगा लेकिन यह सच्चाई नहीं है। तेल की कीमत के गिरने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो प्रभाव होंगे यदि हम उन्हें नज़र अंदाज़ भी कर दें तब भी यह सच्चाई है कि तेल के मूल्यों में गिरावट से फार्स की खाड़ी के देश प्रभावित होंगे। क्योंकि यह देश पूरी तरह से तेल और गैस निर्यात से हासिल होने वाली आमदनी पर निर्भर हैं विशेषकर सऊदी अरब, क़तर, कुवैत और ओमान पूरी तरह से तेल और गैस पर निर्भर हैं।
तेल निर्यात करने वाले देशों की आमदनी कम हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई है और क़तर जैसे देशों को तो इससे लाभ ही हुआ है क्योंकि कोरोना संकट की वजह तेल की तरह गैस की मांग कम नहीं हुई बल्कि पिछले दो हफ्तों के दौरान पूरी दुनिया में गैस की मांग में वृद्धि हुई है।
अब इस संकट का दूसरा रुख! तेल की कीमत में गिरावट से जो संकट पैदा हुआ है वह तेल से आमदनी से चलने वाले देशों के लिए सुनहरा अवसर भी हो सकता है। फार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों और इसी तरह पश्चिमी देशों के विशेषज्ञ बहुत पहले से चेतावनी दे रहे थे कि कि तेल पर निर्भर अर्थ व्यवस्था का अंजाम बहुत बुरा हो सकता है। अब जबकि उस अंजाम को यह देश अपनी आंखों से देख रहे हैं तो उनके लिए यह अवसर है कि वह अभी से अपनी अर्थ व्यवस्था में सुधार ले आंए। इस लिए विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर तेल पैदा करने वाले देश इस अवसर से सही रूप से लाभ उठाएं तो यह उनके लिए एक सुनहरा दौर हो सकता है जिसमें वह अपनी आर्थिक और राजनीतिक नीतियों में बड़े बदलाव कर सकते हैं। जैसे!
- इस दौरान तेल व गैस निर्यात करने वाले देश तेल पर भरोसे के बजाए अपने उत्पादन में विविधता पैदा कर सकते हैं। यह देश, तकनीक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नये अवसर पैदा कर सकते हैं लेकिन ज़ाहिर सी बात है इसके लिए बहुत बड़े बजट की ज़रूरत है।
- तेल निर्यात करने वाले अरब देश, पश्चिम देशों की दिवालिया हो जाने वाले परियोजनाओं में पूंजीनिवेश के बजाए अरब देशों में निवेश पर ध्यान देना चाहिए। कृषि क्षेत्र, मूल भूत योजनाओं में पूंजीनिवेश के लिए वह अफ्रीका में चीन के निवेश से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
- तेल निर्यात करने वाले अरब देश युद्धों और झड़पों को खत्म करके भी अपनी हालत सुधार सकते हैं। सऊदी अरब ने यमन युद्ध छेड़ कर अपनी और अपने घटकों की दौलत का बहुत बड़ा हिस्सा बर्बाद कर दिया है। फार्स की खाड़ी के देश पहले की तरह, संभल कर क़दम बढ़ाने की अपनी पुरानी नीति की तरफ वापस लौट सकते हैं। अगर अरब देश उसी पुरानी नीति पर चल रहे होते तो आज यमन युद्ध की आग नहीं भड़कती न ही लीबिया का यह हाल होता और न ही मिस्र में इस तरह की तबाही होती। यमन, लीबिया और मिस्र में युद्ध की आग अगर शांत होती है तो अरब देशों की पुंजी का बहुत बड़ा हिस्सा बच सकता है। अगर सऊदी अरब और यूएई अरब जगत के विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध भड़काने के लिए आर्थिक मदद बंद कर दें तो बड़े पैमाने ्सा बच सकता है। अगर सऊदी अरब और यूएई अरब जगत के विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध भड़काने के लिए आरपर शांति स्थापना के साथ ही साथ अरब देशों का धन भी बच सकता है। आशा है कि तेल की क़ीमत में भारी गिरावट, अरब देशों को यह सब सोचने पर मजबूर करेगी।
निष्कर्षः
हालांकि तेल की कीमत में भारी गिरावट फार्स की खाड़ी के देशों और अन्य अरब देशों के लिए बहुत सी समस्याओं का कारण रही है लेकिन अगर यह देश सचेत हो जाएं और इस झटके को अपने लिए अवसर बना लें तो निश्चित रूप से यह उनके भविष्य में एक सुनहरा मोड़ कहा जाएगा। Q.A. साभार, अरबी 21, मिस्र