15 अप्रैल 2020 - 13:39
दुनिया के सामने कोरोना वायरस से भी ज़्यादा ख़तरनाक चुनौतियां, दुनिया में नफ़रत का व्यापार करने वाले किस बात से हैं ख़ुश?

यह जो संकट होते हैं, यह किसी न किसी अवसर को ज़रूर जन्म देते हैं और कोरोना जैसे अनोखे संकट उतने ही अभूतपूर्व अवसरों को जन्म देते हैं। दुनिया के फासीवादी, तानाशाह और ऐसे महत्वकांक्षी लोग जिनके दिलों में फासीवादी बनने की इच्छा होती है, वे ऐसे गंभीर संकटों में न केवल अपने षड्यंत्रकारी कार्यों को जारी रखते हैं बल्कि इन संकटों को अपने लिए अवसर मानते हुए कृत्यों में और तेज़ी ले आते हैं। क्योंकि वे लोग समझते हैं कि दुनिया संकट में उलझी हुई है इसलिए वे कुछ भी करेंगे उसपर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आएगी।

बुनियादी तौर पर इसका अर्थ यह हुआ कि वायरस तानाशाही सोच को तेज़ी से पनपने में मदद कर रहा है।हंगरी के नेता विक्टर ओबन का उदाहरण ही ले लीजिए कि जिन्होंने सार्वजनिक भावना का सहारा लिया और सत्ता को प्राप्त करने के लिए क्रूरतापूर्ण तरीक़े से इस वायरस को अपना हथियार बनाया और हंगरी के बचे-खुचे लोकतांत्रिक चेहरे को भी अपनी इस कार्यवाही से तबाह कर दिया। जिस सदन में वे दो-तिहाई बहुमत रखते हैं उसी के सामने खड़े होकर उन्होंने हंगरी को कोरोना वायरस से बचाने के नाम पर स्वयं के लिए असीमित अधिकार के प्रस्ताव को पारित कराया, जिसके अनुसार अब उनके पास ऐसे बहुत से अधिकार होंगे कि जिसकी को कोई तारीख़ नहीं है और न ही उसकी कोई निगरानी कर सकता है। सभी चुनावों और जनमत संग्रह को रद्द करने के साथ ही अब विक्टर ओबन को यह अधिकार प्राप्त हो गया है कि वह कोरोना वायरस से निपटने के उनकी सरकार के प्रयासों की बारे में झूठ फैलाने वालों को 5 वर्षों की जेल होगी। लेकिन झूठ क्या है और क्या नहीं इसका फ़ैसला वह ख़ुद करेंगे। इसके अलावा कोरोना वायरस का संकट कब समाप्त होगा और कब उनके अधिकार समाप्त होंगे इसका फ़ैसला भी वह स्वयं ही लेंगे। इसलिए यह कहा जा रहा है कि जब तक विक्टर ओबन हैं तबतक अब हंगरी से यह संकट समाप्त नहीं होने वाला है। फिलीपींस में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिल रही है।

यहां पर कुछ लोग यह सवाल कर सकते हैं कि तानाशाह सोच संकट से निपटने में सकारात्मक भूमिका निभाती है, जैसा कि चीन में यह देखा गया है, तो अगर संकट से निपटने के लिए इस सोच का इस्तेमाल किया जाता है तो क्या बुराई है? तो इस बारे में यह कहा जा सकता है कि संकट को रोकने के लिए हमे आवश्यकता के अनुसार हर तरह के फ़ैसेल और क़दम उठाने चाहिए लेकिन मानवीय अधिकारों का ख़्याल करते हुए। क्योंकि हम यह सभी कार्यवाहियां और फ़ैसले मानवता की रक्षा के लिए कर रहे होते हैं लेकिन अगर इन्हीं फ़ैसलों से इंसानों को और अधिक नुक़सान पहुंचने लगे तो हमे ज़रूर देखना चाहिए कि हमारे फ़ैसले सही हैं या नहीं। वास्तव में इस तरह की तानाशाही सोच संकट के बाद आने वाले समय में पेश आएगी, क्योंकि एक बार किसी नेता को सभी अधिकारों वाली छूट मिल जाएगी तो फिर उससे इस छूट का अधिकार वापस लेना बहुत ही कठिन होगा।

दूसरी ओर दुनिया में नफ़रत और घृणा का व्यापार करने वाले ऐसे अवसरों की तलाश में होते हैं। इसलिए कोरोना वायरस का संकट आते ही इस तरह के लोग तुरंत सक्रीय हो गए और बिना समय बर्बाद किए उन्होंने इस घातक वायरस को संप्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया और लोगों के बीच नफ़रत फैलाने लगे। ऐसे कामों में हमेशा की तरह आगे-आगे रहने वाले भारत की कुछ कट्टरपंथी हिन्दू गुटों और उनके समर्थक मीडिया का उदाहरण लिया जा सकता है। पहले से ही संप्रदायिक तनाव को भड़काने और मुसलमानों को बुरा दिखाने की ताक में रहने वाले भारतीय मीडिया और कट्टरपंथी हिन्दू गुटों को कोरोना वायरस के नाम पर एक अवसर हाथ लगा है। इस समय भारतीय मीडिया और कट्टरपंथी हिन्दू गुट कोरोना वारयरस के फैलाव के लिए अन्य सभी कारणों को भुलाकर इस संकट का पूरे तौर पर ज़िम्मेदार भारत के मुसलमानों को बताने में जुट गए हैं। सोशल मीडिया पर सक्रीय आरएसएस और उससे जुड़े दूसरे सभी कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ता झूठी ख़बरों, पहले की तस्वीरों और वीडियो को प्रकाशित करके पूरे भारत में कोरोना वायरस के लिए भारतीय मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताने की साज़िशों में आगे आ गए हैं।

याद रहे कि झूठी ख़बरों का वास्तविक प्रभाव होता है। यही कारण है कि छोटे शहरों और गांवों से इस वायरस के फैलाव का मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताकर उनके ख़िलाफ़ हिंसा की ख़बरें आने लगी हैं। इस तरह के समाचार भारत की राजधानी दिल्ली सहित कुछ बड़े शहरों से भी आ रहे हैं, जिसमें लगातार वृद्धि हो रही है। इसी तरह दुनिया पर नज़र डालें तो अमेरिका इस वायरस को ग़लत फ़ायदा उठाकर तेहरान पर और अधिक प्रतिबंध लगाकर जहां ईरानी राष्ट्र को कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग में हराने की नाकाम कोशिश कर रहा है वहीं ज़ायोनी शासन (इस्राईल) दुनिया में फैली इस महामारी को अवसर मानते हुए फ़िलिस्तानियों के ख़िलाफ़, उसके द्वारा की जाने वाली अत्याचारपूर्ण कार्यवाही में लगातार वृद्धि कर रहा है। कुला मिलाकर जहां दुनिया के अधिकतर देश कोरोना वायरस से लड़ने के लिए अलग-अलग शोध और उपाय ढूंढ रहे हैं वहीं दुनिया की फासीवादी शक्तियां इसे अवसर मानते हुए अपनी साज़िशों को बढ़ा रही हैं। यही समय है कि दुनिया ऐसी सभी शक्तियों और गुटों को पहचाने और एकजुट होकर इसका समाधान निकाले और इनके ख़िलाफ़ ऐसे क़दम उठाए कि दुनिया कोरोना वायरस के साथ-साथ इनके वायरस से भी पवित्र हो जाए।