20 मार्च 2020 - 17:21
ईरान में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम

ईरान में आजसे 69 साल पहले 29 इस्फ़ंद बराबर 19 मार्च को तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया था और इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से इस दिन को तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह ऐतिहासिक निर्णय उस समय देश की संसद ने किया था और इस विधेयक को क़ानून बना दिया था और इस तरह ईरान के राजनैतिक इतिहास में एक नया मोड़ आ गया था। ईरान में तेल का राष्ट्रीयकरण, एक ऐतिहासिक आंदोलन और कड़े व चुनौतीपूर्ण संघर्ष का नतीजा था। इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को समझने के लिए अतीत पर एक नज़र डालनी होगी, जब ईरानी राष्ट्र की एक बहुत बड़ी संपत्ति यानी तेल पर वर्चस्ववादी और लूटेरी शक्तियों ने लोभ की दृष्टि डाल रखी थी।

तेल की खोज करने वाले अच्छी तरह जानते थे कि तेल या काला सोना बरसों बल्कि शताब्दियों तक संसार पर उनके वर्चस्व और आर्थिक व औद्योगिक साम्राज्य को सुनिश्चित बना सकता है। इस आधार पर इस पूरे प्रकरण में एक तरफ़ तेल के मालिक देश थे और दूसरी तरफ़ औद्योगिक दुनिया थी जो तेल की भूखी थी। साम्राज्य की ओर से तेल की लूट उस समय शुरू हुई जब पश्चिम में उद्योग पहिये घूमने लगे थे और नए नए औद्योगिक बने देशों ने यह समझ लिया था कि उद्योग के विकास और उस विकास को जारी रखने के लिए वे पूरी तरह तेल पर निर्भर हैं। अगर वे तेल तक अपनी पहुंच को सुनिश्चित नहीं बना पाए तो हमेशा के लिए इस महान संपत्ति के मालिकों के मोहताज रहेंगे।

यही कारण था कि उन्होंने विभिन्न प्रकार की चालों, साज़िशों और हथकंडों के माध्यम से तेल पर अपने वर्चस्व को थोपने की कोशिश शुरू कर दी। उनके हथकंडों में अवैध क़ब़्ज़ा, अन्यायपूर्ण समझौते और तेल निकाले जाने से ले कर बेचने तक के चरणों पर अपना वर्चस्व जमाना शामिल है। इस तरह से उन्होंने इस मूल्यवान तत्व और उसके सभी आयामों पर क़ब्ज़ा जमाने का काम शुरू कर दिया। इतिहास साक्षी है कि किस प्रकार विदेशी कंपनियों ने अन्याय व अत्याचार से भरे समझौते करके बरसों तक ईरानी राष्ट्र के स्रोतों को लूटा और तत्कालीन ईरानी सरकारों ने अपनी जनता के अधिकारों की बहाली के किसी भी तरह की कोई कोशिश नहीं की।

उस समय के अंतर्राष्ट्रीय हालात ऐसे थे कि विभिन्न देश विशेष कर सोवियत यूनियन, ब्रिटेन व अमरीका, ईरान की सरकार के प्रस्तावों से तेल के क्षेत्र में अधिक से अधिक विशिष्टताएं व सुविधाएं लेने के चक्कर में थे। चूंकि ब्रिटेन को ईरान के दक्षिण में स्थित तेल के स्रोतों को इस्तेमाल करने का लाइसेंस मिला हुआ था इस लिए रूसी, उत्तरी ईरान के तेल स्रोतों का लाइसेंस हासिल करने की कोशिश में थे जबकि अमरीकी भी ईरान में तेल के क्षेत्र में विशिष्टताएं लेने के चक्कर में थे।

उस समय ईरान ने अन्य देशों से जो शर्मनाक समझौते किए थे उनमें से एक गस-गुलशाइयान समझौता था जिस पर सन 1933 में हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते पर ईरानी समाज के जागरूक लोगों और बुद्धिजीवियों विशेषकर आयतुल्लाह काशानी ने कड़ी आपत्ति जताई। ईरान के संघर्षकर्ता धर्मगुरू आयतुल्लाह काशानी उस संवेदनशील समय में सरकार से संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए और उन्होंने उस समय के घुटन भरे माहौल और संसद द्वारा पारित किए गए ग़ैर क़ानूनी प्रस्तावों व अन्य देशों की तेल कंपनियों से होने वाले ग़ैर क़ानूनी समझौतों के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ को एक पत्र लिखा। उन्होंने ब्रिटेन की तेल कंपनी की कार्यवाहियों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कई सांसदों के साथ मिल कर ब्रिटेन के तेल कंसरशियम के साथ हुए समझौते को रद्द करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया। अंग्रेज़ सरकार के कहने पर शाही शासन ने एक दमनात्मक कार्यवाही के अंतर्गत आयतुल्लाह काशानी को गिरफ़्तार करके निर्वासित कर दिया।

इसके बाद ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मुसद्दिक़ ने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का बीड़ा उठाया और उन्होंने अपने संघर्ष के दौरान कई बार इस बात पर बल दिया कि अपने तेल स्रोतों से लाभ उठाने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ ईरानी जनता को मिलना चाहिए। उन्होंने उत्तरी ईरान के तेल स्रोतों का लाइसेंस हासिल करने के लिए सोवियत संघ की ओर से डाले जा रहे दबाव का मुक़ाबला करने के उद्देश्य से संसद में एक क़ानून पारित करवाया जिसके तहत सरकार तेल के लाइसेंस के बारे में तब तक किसी से भी वार्ता नहीं कर सकती थी जब तक ईरान में विदेशी सैनिक मौजूद थे। अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर हुमायून कातूज़ियान इस बारे में कहते हैं कि तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का आंदोलन मूल रूप से ईरान को संपूर्ण स्वाधीनता दिलाने के उद्देश्य से शुरू हुआ था ताकि देश में एक टिकाऊ प्रजातंत्र स्थापित किया जा सके।

ईरान की संसद में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का क़ानून पारित होने के बाद, तेल उद्योग पर से ईरान व ब्रिटेन की तेल कंपनी का अधिकार समाप्त कर दिया गया और तेल उद्योग को राष्ट्रीय घोषित कर दिया गया। इसके बाद ईरान से कड़ी दुश्मनी की शुरुआत हो गई। वर्ष 1953 में डाक्टर मुसद्दिक़ की क़ानूनी सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह जैसे हथकंडे, ईरान के तेल स्रोतों की लूट-मार और ईरान के मामलों में हस्तक्षेप जैसी चालें इसका उदाहरण हैं। अंग्रेज़ों ने ईरान के तेल का बहिष्कार कर दिया और अन्य देशों पर भी दबाव डाला कि वे ईरान का तेल न ख़रीदें।

जब मुसद्दिक़ की सरकार ने 1951 में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के क़ानून को लागू करना चाहा तो उनके ख़िलाफ़ साज़िशें तेज़ हो गईं। ब्रिटिश व अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान की शाही सरकार के समर्थन से फ़ायदा उठा कर अमरीका व यूरोप की 16 तेल कंपनियों पर आधारित एक कंसरशियम की ओर से ईरान पर एक समझौता थोप दिया और एक बार फिर ईरान के तेल को लूटना शुरू कर दिया। इस कंसरशियम में ब्रिटिश पेट्रोलियम, शेल पेट्रोलियम, गल्फ़ आयल कार्पोरेशन, मोबिल आयल कार्पोरेशन, स्टेंडर्ड आयल कंपनी आफ़ कैलीफ़ोर्निया एंड टेक्सास जैसी तेल कंपनियां शामिल थीं।

तेल पर निर्भरता, चाहे वह अतीत में रही हो या वर्तमान समय में, जब तेल को ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध और दबाव के एक हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, हमेशा ही राष्ट्रीय हितों के ख़िलाफ़ रही है। तेल उद्योग पर निर्भरता कम करने के लिए कुछ बातें आवश्यक हैं जिनकी तरफ़ इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था के मानकों की व्याख्या के दौरान कई बार संकेत किया है। उन्होंने कहा है कि यह निर्भरता हमारी सौ बरसों की शर्मनाक धरोहर है। उन्होंने प्रतिबंधों को भी इस नज़र से देखा है और हमेशा बल दिया है कि इस अवसर से लाभ उठाना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि अन्य आय वाली आर्थिक गतिविधियों को तेल का विकल्प बनाया जाए।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने अपना पद संभालने के आरंभिक दिनों में ही कहा थाः कुछ अन्य लोगों के विपरीत मुझे इस बात की आशंका है कि दुश्मन, ईरानी जनता को इस मार्ग पर चलने से रोकने और निराश करने के लिए हम पर नई आर्थिक समस्याएं थोप सकता है। बहुत संभव है कि वह तेल की बिक्री, कच्चा माल और आवश्यक वस्तुए हासिल करने में हमारे सामने समस्याएं पैदा करे ताकि लोगों पर दबाव बढ़ा सके। सरकार, संसद और अधिकारियों को कंधे से कंधा मिला कर जनता की आर्थिक समस्याओं को करने के लिए उत्तम व सफल मार्गों व शैलियों को खोजना चाहिए।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने पिछले दशक के आरंभ में प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था के गठन और ऐसी अर्थव्यस्था की ओर उन्मुख होने पर बल दिया था जो तेल पर निर्भर न हो। इस संबंध में वे कई बार कह चुके हैं कि ईरान की सबसे बड़ी आर्थिक समस्याओं में से एक तेल पर निर्भरता है। इसी आधार पर उन्होंने कच्चे तेल की बिक्री की आलोचना करते हुए उसे न्यूनतम सीमा पर पहुंचाने पर बल दिया है।

आज तेल के उद्योग पर हमले के संबंध में हम जो कुछ देख रहे हैं वह एक संपूर्ण आर्थिक युद्ध है। तेल, ईरानी अर्थव्यवस्था का दिल है और अमरीकी वित्तमंत्रालय ईरान के पेट्रोलियम मंत्रालय से इस लड़ाई में फ़्रंट लाइन पर लड़ रहा है। ट्रम्प सरकार ने ईरान के तेल निर्यात पर सबसे कड़े अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगा रखे हैं और उसे जहां भी ईरान के तेल के निर्यात के लिए कोई खिड़की खुली हुई दिखाई देती है, वह उसे तुरंत बंद करने की कोशिश करता है। अमरीकी वित्त मंत्रालय के आतंकवाद व आर्थिक सूचना विभाग को, अमरीका के वॉर रूम का केंद्र कहा जा सकता है जो हालिया कुछ बरसों में तेल के प्रतिबंध पर केंद्रित हो गया है। इस विभाग को सन 2004 में जॉर्ज बुश जूनियर की सरकार में आतंकवाद से युद्ध के आर्थिक आयामों को समन्वित करने के बहाने बनाया गया था और इस समय प्रतिबंध के मामलों की लगभग सभी ज़िम्मेदारियां इसी विभाग के पास हैं। ईरान के बारे में इस विभाग में सीधे तौर पर काम करने वाले विशेषज्ञों की संख्या कम से कम 400 है।

द फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसीज़ (Foundation for Defense of Democracies) नामक इंस्टीट्यूट के निदेशक मार्क डुबोविट्ज़ ने, जो ट्रम्प सरकार से निकट संबंध रखते हैं, पिछले साल “रियाल की जंग” के नाम से लिखे गए अपने लेख में ईरान पर दबाव के बारे में अमरीकी वित्त मंत्रालय को दिए गए अपने एक अहम मशवरे की ख़बर दी थी। उन्होंने बताया था कि वित्त मंत्रालय से उन्होंने कहा है कि वह प्रतिबंध के साधन के प्रयोग को पहले से अधिक बढ़ा दे और ईरान से सहयोग करने वाले यूरोपीय अधिकारियों और बैंकों तक पर प्रतिबंध लगा दे।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के बरसों में यद्यपि इस बात की बहुत ज़्यादा कोशिश की गई कि प्रतिबंध के हथकंडे को इस्तेमाल करके ईरान के तेल उद्योग के विकास को रोक दिया जाए लेकिन न केवल यह कि ईरान के तेल उद्योग का विकास नहीं रुका बल्कि हमने देखा कि ईरान में तेल व गैस की अनेक नई परियोजनाएं भी शुरू की गईं जो इस समय तेज़ी से काम कर रही हैं। ईरान, क्षमता, सृजनात्मकता और मूल्यवान स्रोतों से मालामाल देश है और प्राकृतिक व मानवीय गुंजाइशों की दृष्टि से बेजोड़ है। ईरान के पेट्रोलियम मंत्री बीजन नामदार ज़ंगने ने गत सितम्बर में संयुक्त बेलाल गैस फ़ील्ड के विकास के समझौते पर हस्ताक्षर के बाद, आगे की ओर ईरान के तेल उद्योग के तेज़ रफ़्तार सफ़र की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था कि हम दुनिया के साथ लेन-देन व सहयोग चाहते हैं लेकिन अगर कोई हमें रोकना चाहेगा तो हम रुकने वाले नहीं है और समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए अपना हर संभव प्रयास करेंगे और अपनी सभी क्षमताओं का इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से ईरान का तेल उद्योग निरंतर आगे की तरफ़ बढ़ रहा है जिससे पता चलता है कि उसे रोकना संभव नहीं है।