17 मार्च 2020 - 17:13
एक सवालः भारत में सांसद किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? घोड़े कहां ले जाएंगे लोकतंत्र को?

भारत को दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है।

अलबत्ता पहला लोकतंत्र तो अमरीका को कहा जाता है लेकिन संख्या के लिहाज़ से भारत को यह उपाधि मिली है हालांकि " पहला" और " बड़ा" लोकतंत्र होने की इन दोनों उपाधियों पर अलग से चर्चा की ज़रूरत है और हमारी चले तो आजकल पहले लोकतंत्र अमरीका और सब से बड़े लोकतंत्र भारत में जो लोकतंत्र का जो रूप नज़र आ रहा है उसे देखते हुए पूरे लोकतंत्र पर ही चर्चा करा दें। खैर अभी तो बात करना चाह रहे हैं मध्य प्रदेश की जहां एक बार फिर, भारत में अलग अलग समय में अलग अलग राज्यों में चलने वाला राजनीतिक ड्रामा चल रहा है। इस ड्रामे  के हीरो और विलेन दोनों ही सांसद होते हैं अलबत्ता उन्हें खरीदने और बेचने की " प्रक्रिया को " हॉर्स ट्रेडिंग " कहा जाता है लेकिन " घोड़े बेचने" का यह धंधा, अस्तबल में नहीं होता बल्कि शानदार रिसॉर्ट में होता है और घोड़े ... माफ कीजिएगा, सांसद बसों की खिड़कियों  से उंगलियों से विक्टरी का निशान बनाते हुए जाते हुए नज़र आते हैं।

    " हॉर्स ट्रेडिंग " तो उस समय से है जब से घोड़े हैं लेकिन अब इसे राजनीति में सांसदों के लेन देन के लिए प्रयोग किया जाता है। इससे कई किस्से कहानियां भी जुड़ी हैं। कहते हैं कि 18वीं शताब्दी में इस शब्द का इस्तेमाल घोड़ों की बिक्री के दौरान व्यापारी करने लगे थे।   

18वीं सदी के आरंभ में  मतलब 1820 के आस पास  जब घोड़ों के व्यापारी अच्छी नस्ल के घोड़ों का लेन- देन करते थे तो उस दौरान बेहतरीन नस्ल के घोड़ों के लिए जोड़ तोड़ करते थे, चतुराई के साथ योजना बनाते थे तो उसे ही हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाने लगा।

कहते हैं कि इस दौरान व्यापारी अपने अच्छे  घोड़ों को छुपा देते थे,  या किसी गुप्त अस्तबल में बांध देते थे या फिर किसी और अस्तबल में पहुंचा देते थे उसके बाद सौदेबाज़ी होती थी और हर व्यापारी अपनी चालाकी और कुशलता के अनुसार फायदा कमाता था।

    इससे जुड़ा दूसरा क़िस्सा भी है और दोनों ही किस्से, आज जिस तरह से सांसदों का लेन देन हो रहा है उस पर फिट बैठता है।

कहते हैं कि  किसी समय में जब भारत के व्यापारी अपने कारिंदों को अरबी घोड़े खरीदने के अरब क्षेत्रों में भेजते थे तो वापसी में कुछ घोड़े मर जाते थे  इस लिए अपने मालिकों को संतुष्ट करने के लिए यह कारिंदे  मर  जाने वाले घोड़ों की पूंछ दिखा देते थे जिससे उनके मालिकों को यह विश्वास हो जाता था कि नौकर ने घोड़ा खरीदा था लेकिन वह रास्ते में मर गया।

 कहते हैं कि हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदली थी तब से  भारत में पार्टी बदलने वालों को आया राम, गया राम कहा जाता है।

सन 1985 में इस तरह की राजनीति को रोकने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दल बदल क़ानून बनवाया जिसके अंतर्गत यह प्रावधान है कि अगर एक तिहाई से कम विधायक अगर दल बदलते हैं तो उनकी विधायकी रद्द हो जाएगी।

कुछ साल तो इस कानून ने काम किया लेकिन फिर राजनीति में इतना पैसा आ गया कि  दल बदलने के लिए उन्हें इतना कुछ मिल जाया करता है कि विधायक हंसी खुशी  इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हो जाते हैं।

    हालिया वर्षों में भारत के कुछ राज्यों में जिस तरह से घोड़ी का व्यापार हुआ है उससे लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले सब दुखी हैं। मध्य प्रदेश की कहानी, इस से पहले भी बार बार दोहरायी गयी है, कई अन्य राज्यों में और आगे भी दोहरायी जाती रहेगी। बस एक सवाल यह है कि सांसदों को जनता का प्रतिनिधि कहा जाता है। एक सांसद एक पार्टी से एक खास विचार धारा के साथ जनता से वोट मांगता है और लोग उसे वोट देते हैं मतलब अपना प्रतिनिधि बना कर संसद या विधान सभा में भेजते हैं लेकिन फिर वह पैसों या पद के लिए अस्तबल बदल लेता है तो क्या किसी प्रतिनिधि को अपनी मर्ज़ी से यह अधिकार होता है?

यह सिलसिला चलता रहा तो भारत का लोकतंत्र बहुत आगे नहीं जा सकता, बल्कि पीछे हटेगा क्योंकि घोड़े लोकतंत्र को आगे नहीं ले जा सकते