वास्तव में दुनिया में असंख्य वायरस हैं जो अलग-अलग बीमारियों का कारण बनते हैं कोरोना भी उनमें से एक है। कोरोना वायरस हमेशा से रहा है सन 2003 में इसे " सार्स " के नाम से जाना गया और सन 2012 में " मेर्स" के नाम से यह वायरस एशिया में फैला था और अब नया कोरोना वायरस चीन से फैला है।
क्या कोरोना से डरना चाहिए?
मेडिकल के हिसाब से कोरोना से बिल्कुल ही नहीं डरना चाहिए क्योंकि कोरोना सर्दी जुक़ाम या वही एन्फ्लूंज़ा की तरह है, वायरस के फैलाव और इलाज का तरीका भी काफी मिलता जुलता है बल्कि एच1एन1 इन्फ्लूंज़ा का फैलाव और उससे होने वाली मौत कोरोना से अधिक है लेकिन ईरान ने उस पर नियंत्रण कर लिया है इसी लिए कोरोना पर भी नियंत्रण हो जाएगा।
सर्दी जुक़ाम हर आयु के लोगों को अपना शिकार बनाता है जबकि कोरोना 9 वर्ष से कम आयु के बच्चों को बहुत कम निशाना बनाता है इस लिए आज कोरोना से जो डर का माहौल बना है उसके पीछे मेडिकल कारण नहीं है।
स्वस्थ्य लोगों को तो कोरोना से बिल्कुल नहीं डरना चाहिए अगर किसी को डरना चाहिए तो वह वह लोग हैं जिनका शरीर बीमारियों का मुकाबला करने की क्षमता कम रखता है या फिर शूगर के मरीज़ हैं, या अंग प्रतिरोपण हुआ है, कैंसर है या फेफड़े की परेशानी है या फिर बूढ़े हैं। इस लिए डरना नहीं चाहिए क्योंकि डर खुद शरीर को रोगों के मुक़ाबले में कमज़ोर कर देता है।
कोरोना के लक्षण क्या हैं?
आम तौर से कोरोना वायरस में ग्रस्त व्यक्ति के बदन में दर्द होता है, सिर में दर्द और जोड़ो में दर्द होता है, भूख खत्म हो जाती है और नाक से पानी बहता है, शरीर निढाल रहता है और कुछ लोगों को लूज़ मोशन और उल्टी भी हो जाती है लेकिन डाक्टरों को तीन लक्षणों से पता चलता है कि कोरोना है या नहीं? अगर 37.7 से तेज़ बुखार हो, खून में आक्सीजन 93 फीसद से कम हो और सीटी स्कैन में फेफड़ा पर सफेदी हो और खांसी आ रही हो। इन निशानियों से कोरोना का होना लगभग पक्का हो जाता है जिसके बाद डाक्टर मरीज़ को इलाज के लिए भेज देता है। लेकिन यह बात जान लेना ज़रूरी है कि कोरोना वायरस में ग्रस्त होने वाले 80 फीसद लोगों को किसी इलाज की ज़रूरत नहीं होती और वह घर में रहें तो और थोड़ा ध्यान रखें तो खुद ही ठीक हो जाते हैं। अस्पताल जाने से कोरोना का संक्रमण बढ़ भी सकता है।