संख्या कम बताने का उद्देश्य यह था कि आम जनमत का आक्रोश रोका जाए।
मास्को में रूसी राष्ट्रपति के साथ वार्ता और समझौते के बाद वापसी में विमान पर पत्रकारों से बातचीत में अर्दोग़ान ने मारे गए तुर्क सैनिको की बड़ी संख्या के बारे में बताया और इस बात पर ज़ोर देने की कोशिश की कि इदलिब में उनका मुक़ाबला सीरियाई सेना से है रूस से नहीं। उनकी यह बात भी पूरी तरह सही नहीं है। क्योंकि इदलिब के इलाक़े में रूस के हवाई हमले में 34 तुर्क सैनिक मारे गए थे और यह बात ख़ुद रूसी अधिकारियों ने कही है। अलबत्ता उन्होंने कहा कि यह तुर्क सैनिक आतंकियों के साथ मौजूद थे और आतंकियों पर होने वाले हमले में मारे गए।
रूस और तुर्की के राष्ट्रपतियों के बीच छह घंटों की लंबी और सघन वार्ता के बाद संघर्ष विराम का जो समझौता हुआ है वह बहुत कमज़ोर है और किसी भी समय हवा में उड़ सकता है क्योंकि इससे पहले भी इस प्रकार के समझौतों का यही अंजाम हुआ है। इसका कारण यह है कि समझौते में सेफ़ ज़ोन की स्थापना के बारे में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है और न ही उन 10 लाख शरणार्थियों के बारे में कुछ कहा गया है जो इस समय तुर्की और सीरिया की संयुक्त सीमा पर मौजूद हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों पक्षों के बीच जिस दस्तावेज़ पर सहमति बनी है उसमें अधिकतर वही बातें हैं जो सूची समझौते में थीं।
सबसे पहली चीज़ यह है कि सीरिया की राष्ट्रीय संप्रभुता और अखंडता का सम्मान किया जाए। यह तुर्क राष्ट्रपति की इच्छा के बिल्कुल विपरीत बात है लेकिन वह मानने पर मजबूर हुए।
दूसरी बात यह है कि रूस और तुर्की दोनों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आतंकवाद से युद्ध किया जाए और अन्नुस्रा सहित उन संगठनों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की जाए जिन्हें सुरक्षा परिषद ने आतंकी संगठन माना है।
तीसरी बात यह है कि दोनों ही पक्षों ने इस बात पर सहमति की है कि सुरक्षा और इन्फ़्रास्ट्रक्चर को ख़तरे में डालने वाले किसी भी क़दम को सहन नहीं किया जाएगा।
चौथा बिंदु यह है कि सीरिया के संकट का कोई सैनिक समाधान नहीं है बल्कि राजनैतिक रास्तों से इसे हल करना होगा।
पांचवां बिंदु यह है कि इदलिब के इलाक़े में लड़ाई रोक दी जाए और छह किलोमीटर चौड़ा कारीडोर बनाया जाए जहां रूस और सीरिया के सैनिक संयुक्त रूप से गश्त करें। यह कारीडोर एम-4 राजमार्ग के समानान्तर बनाया जाएगा।
इस समझौते पर सरसरी नज़र डालने से यह समझ में आता है कि सीरियाई सेना एसे किसी भी इलाक़े से बाहर नहीं निकलेगी जो उसने इदलिब में हालिया हफ़्तों के दौरान आज़ाद कराए हैं। हालांकि राष्ट्रपति अर्दोग़ान यह मांग ज़ोर शोर से उठा रहे थे और न पूरी होने की स्थिति में सैनिक कार्यवाही की धमकी भी दे रहे थे।
यह हक़ीक़त में राष्ट्रपति अर्दोग़ान को बाहर निकलने का एक रास्ता दिया गया है। इसमें न तो शरणार्थियों के मसले का कोई हल है और न ही दूसरे बिंदुओं पर पाए जाने वाले मतभेद का कोई हल पेश किया गया है। इससे लगता है कि यह समझौता ज़्यादा दिन नहीं चलेगा।
पुतीन अपनी मांग से एक इंच पीछे नहीं हटे हैं कि चरमपंथी संगठनों का सफ़ाया किया जाए बल्कि उन्होंने इस अभियान में शामिल होने के लिए तुर्क राष्ट्रपति को भी मजबूर किया है हालांकि तुर्की इन चरमपंथी संगठनों का बहुत बड़ा समर्थक है।
राष्ट्रपति पुतीन ने सीरियाई राष्ट्रपति बश्शार असद को फ़ोन करके समझौते के मुख्य बिंदुओं के बारे में बताया जिस पर राष्ट्रपति असद ने पुतीन का आभार व्यक्त किया। आख़िर में हम यही कहेंगे कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान मास्को से कुछ ख़ास हासिल करके नहीं लौटे बस संघर्ष विराम का एक कमज़ोर सा समझौता उनके हाथ लगा है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के मशहूर टीकाकार व लेखक