29 फ़रवरी 2020 - 19:19
कोरोना वायरस, ईश्वरीय प्रकोप या षडयंत्र? यह रहे आधुनिक और मध्ययुगीन तरीके... क्या लौट रही है दुनिया पुराने युग में? न्यूयार्क टा

जब से चीन में कोरोना वायरस का पता चला है उसके बारे में अनुमान और भविष्यवाणी का सिलसिला भी चल निकला है। सब से पहले तो लोगों ने इसे चीनी नागरिकों के खान- पान से जोड़ा और फिर इसे ईश्वरीय प्रकोप बताया तो कुछ लोगों ने इसे चीन और अमरीका के दुश्मनों के खिलाफ “ जैविक युद्ध” बताया।

  फ्रांस में रहने वाले ट्यूनेशिया के धर्मगुरु, बशीर बिन हसन का कहना है कि कोरोना वायरस, चीनियों पर ईश्वर का प्रकोप हैं। उनका कहना है कि चीन ने दस लाख वीगर मुसलमानों को अलग- थलग रखा और अब 6 करोड़ चीनी दुनिया से कटे हुए हैं और एसी बीमारी में फंसे हैं जिसका कोई इलाज ही नहीं है।

     बशीर बिन हसन के इस फेसबुक पोस्ट पर मलेशिया के एक मुसलमान ने कमेंट किया कि मलेशिया में भी कोराना पहुंच चुका है तो क्या ईश्वर मलेशियाई मुसलमानों को भी दंडित कर रहा है?

     इसी तरह मिस्र में अलअज़हर युनिवर्सिटी के धर्मगुरु अहमद ईसा अलमोअसरावी ने कहा कहा कि जब चीन ने दस लाख वीगर मुसलमानों को अलग थलग किया तो ईश्वर ने चीन को दुनिया से अलग थलग कर दिया। लेकिन इराक़ के एक नागरिक ज़ैद हमदानी ने उनकी ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा कि स्वंय को ईश्वर की जगह न रखो ईश्वर कभी सामूहिक रूप से इस तरह से दंडित नहीं करता, वह कभी गेहूं के साथ घुन को नहीं पीसता।

 इस्लामी शिक्षाओं इस बात की अनुमति नहीं है कि दूसरों के दुखों पर व्यंग्य किया जाए बल्कि दूसरा कोई भी हो मुसीबत में उसकी सहायता पर बल दिया गया है। इस्राईली समाचारपत्रों के अनुसार, यहूदी धर्मगुरुओं का भी यही हाल है और वह भी समस्याओं को पापों का परिणाम समझते हैं।

     सच्चाई यह है कि कोरोना एक वायरस है एक बीमारी है और उससे बचने का तरीका है जो लापरवाही करेगा वह इस वायरस में ग्रस्त होगा। यह वायरस धर्म व जाति नहीं व राष्ट्रीयता नहीं पहचानता। इस समय दुनिया के दसियों देशों मे यह वायरस फैल चुका है जिनमें हर धर्म के मानने वाले रहते हैं। वैसे कोरोना वायरस के बारे में सरकारों के व्यवहार भी सामान्य नहीं हैं।

     सन 2002 से विभिन्न प्रकार की महामारी के बारे में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार डोनाल्ड मिक नील ने न्यूयार्क टाइम्ज़ में कोरोना वायरस पर अपने एक लेख का शीर्षक रखा है “ कोरना से खत्म करने के लिए मध्ययुगीन शैली अपनाएं” वह लिखते हैं कि हर महामारी से मुक़ाबले के दो रास्ते होते हैं, आधुनिक शैली और मध्ययुगीन शैली। आधुनिक शैली तो यह है कि  आप नये नये आविष्कारों का प्रयोग करें, एंटीबायोटिक दवाएं, टीके आछि का प्रयोग करें, आधुनिक अस्पताल बनाएं और आधुनिक मशीनों का प्रयोग करके वायरस को लोगों के भीतर से खोज निकालें, मगर मध्ययुगीन शैली ज़रा क्रूर है, यह “ काली मौत “ के अनुभव से हमें मिली है,  सीमाओं को बंद कर दें, जहाज़ों को तट से दूर रखें, डरे सहमे नागरिकों को नगरों में क़ैद कर दें।

      पहली बार लगभग एक  सदी पहले इन्सानों ने यह फैसला किया कि महामारी के सामने दस्ताने पहन कर नहीं बल्कि लोहे का पंजा पहन कर जाएं, कुछ समय तक यह शैली प्रभावशाली रही शायद आज भी बहुत से लोग इसी शैली में विश्वास रखते हैं।

  चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कोरोना वायरस के केन्द्र “ वूहान” नगर को इसी तरह से पूरी दुनिया से काटने में सफल रहे। वूहान की घेराबंदी कर दी गयी, कोई व्यक्ति उस शहर से नहीं निकल सकता, भले ही उसे सड़कों पर सोना पड़े।

      चीन तो चीन है लेकिन रोचक बात यह है वाइट हाउस ने भी अमरीकी इतिहास के विपरीत, चीन जैसा रवैया अपनाया और चीन तथा अन्य देशों से यात्रियों के आगमन पर रोक लगा दी और अमरीकियों से कहा कि वह चीन और दक्षिणी कोरिया जैसे देशों की यात्रा न करें, यह वही मध्ययुगीन शैली है। करेन्टाइन (Quarantine) नामक किताब के लेखक डाक्टर हावर्ड मर्कल कहते हैं कि सन 1892 से अमरीका में इस प्रकार के यात्रा प्रतिबंध नहीं लगाए गये। सन 1892 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बेन्यामिन हैरीसन ने आदेश दिया था कि हम्बर्स के सभी जहाज़ 20 दिनों तक तट से दूर समुद्र के भीतर रुके रहें क्योंकि इस नगर के अधिकारियों को शक था कि महामारी फैल सकती है। शायद यह उपास प्रभावी भी रहा क्योंकि अमरीका में सन 1832, 1870 और 1910 में महामारी फैली थी लेकिन 1892 में नहीं फैली।

 आज दुनिया के बहुत से विशेषज्ञ, किसी भी देश की सीमाओं को सील करना प्राचीन शैली और एक  असंभव काम  बताते हैं लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए यह एक स्वाभाविक क़दम है। सन 2014 में जब अमरीका के कई बहादुर डाक्टर और चिकित्सा कर्मी पश्चिमी अफ्रीका में एबोला वायरस से युद्ध के दौरान, इस वायरस का शिकार हो गये थे तो डोनाल्ड ट्रम्प ने मांग की थी कि वह अपनी मौत तक वहीं रहें।

     यहीं नहीं अमरीकी सरकार ने तो सैन्य छावनियों में भी आइसोलेशन सेंटर बना दिये हैं, किसी ज़माने में जब वीनस में प्लेग या काली मौत फैली थी तो यही काम किया गया था। आज दुनिया भर के विशेषज्ञों का मानना है कि आइसोलेशन या किसी भी नगर को अलग थलग करना वायरस से अधिक भयानक परिणाम का कारण हो सकता है और नगर में फंस जाने वाले लोग, महामारी को और फैला सकते हैं और बहुत से लोग घबराहट में मर सकते हैं।

      यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, यात्रा और व्यापार पर रोक का विरोधी है और यह संगठन किसी भी देश के आइसोलेशन या दुनिया से अलग थलग करने का समर्थन नहीं करता।