सूरए ताहा की आयत क्रमांक 132 का अनुवादः
और (हे पैग़म्बर!) अपने परिजनों को नमाज़ का आदेश दीजिए और स्वयं भी उस पर जमे रहिए। हम आप (सहित किसी) से कोई रोज़ी नहीं माँगते (बल्कि) हम ही तो हैं जो आप (सहित सभी) को रोज़ी देते हैं और अच्छा अंत तो ईश्वर से भय (रखने वालों) ही के लिए निश्चित है।
संक्षिप्त टिप्पणी:
यदि मैं तुम्हें नमाज़ का आदेश देता हूं तो उसका कारण यह है कि तुम संसार पर मोहित न हो और दिन में कई बार प्रलय को याद करो, प्रलय के अपने स्थायी जीवन को याद रखो और उस संसार के लिए प्रयास करते रहो।
इस आयत से मिलने वाले पाठ:
- पुरुष अपने परिवार व संतान के धार्मिक प्रशिक्षण के संबंध में उत्तरदायी है और केवल उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर्याप्त नहीं है।
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बच्चे के प्रशिक्षण का सबसे पहला चरण, पाठशाली नहीं अपितु परिवार है।
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ईश्वर को हमारी उपासनाओं कसे कोई लाभ नहीं पहुंचता बल्कि इन उपासनाओं के परिणाम स्वयं हमें प्राप्त होते हैं।