सूरए ताहा की आयत क्रमांक 127 का अनुवादः
और इस प्रकार हम, सीमा का उल्लंघन करने और अपने पालनहार की आयतों पर ईमान न लाने वाले को बदला देते हैं और निश्चय ही प्रलय का दंड तो अत्यन्त कठोर और अधिक स्थायी है।
संक्षिप्त टिप्पणी:
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आस्था व ईमान की दृष्टि से कुफ़्र में ग्रस्त हो जाते हैं और कर्म के क्षेत्र में भी संतुलन के सीधे मार्ग से विचलित हो कर अतिवाद एवं चरमपंथ की ओर उन्मुख हो जाते हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठ:
- पाप, जो एक प्रकार से अपव्यय और ईश्वरीय अनुकंपाओं का ग़लत प्रयोग है, ईश्वर पर ईमान से मेल नहीं खाता।
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अपने कर्मों के परिणामों का हिसाब किताब करते समय, प्रलय में ईश्वर की ओर से दिए जाने वाले पारितोषिक और दंड को संसार के लाभ और हानि से अधिक महत्व देना चाहिए।