5 फ़रवरी 2020 - 16:29
दाइश का नया बसेराः अफ़ग़ानिस्तान को अपना नया ठिकाना बना रहा है दाइश, आतंकी संगठनों के पीछे क्या है बड़ी ताक़तों का खेल?!

अफ़गानिस्तान की दुनिया भर के लोगों में एक खास तरह की छवि है। हथियार बंद क़बीले, कट्टरपंथ, वहाबियत, तालिबान , दाइश और अलकाएदा जैसे विषय, अफगानिस्तान के साथ जुड़े हैं।

अफगानिस्तान, पिछले तीन दशकों से प्राक्सी वॅार का भी केन्द्र रहा है। अफगानिस्तान में सऊदी अरब , अमरीका और इस्राईल जैसी सरकारें, दाइश और अन्य आतंकवादी गुटों को अपने उद्देश्यों के लिए प्रयोग करती हैं। 


हालांकि आतंकवादी संगठन दाइश ने अपनी तथाकथित इस्लामी खिलाफत का केन्द्र इराक़ और सीरिया को बना रखा था लेकिन जब इन क्षेत्रों में उसकी खिलाफत मिट्टी में मिल गयी तो उसने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत तथा दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रों में अपना ठिकाना खोजने की कोशिश की। 13 जनवरी सन 2015 को जारी होने वाले एक वीडियो में दाइश ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि वह अफगानिस्तान व पाकिस्तान में " खुरासान" नामक अपनी शाखा खोल रहा है। इस वीडियो में पाकिस्तान तालिबान के पूर्व प्रवक्ता, शहीदुल्लाह शहीद ने दाइश के कई कमांडरों का नाम लिया और उन्हें अफगािनस्तान के अलग अलग इलाक़ों का प्रमुख बताया। 

आतंकवादी संगठन दाइश जिसे आईएसआईएस भी कहा जाता है अतिवादी तकफीरी विचारधारा रखता है जिसका प्रेरणा स्रोत वहाबियत है। इस विचारधारा में हिंसा व कट्टरपंथ को महत्व प्राप्त है। दाइश की विचारधारा के अनुसार, वहाबियत से अलग हर विचारधारा और हर मत, धर्म विरोधी और अधर्म है। ब्रिटेन की खुफिया एजेन्सी एम आई-6 के पूर्व अधिकारी, एलस्टर क्रोक इस बारे में कहते हैं ः दाइश मूल रूप से एक वहाबी संगठन है और निश्चित रूप से सऊदी अरब में प्रचिलत वहाबी विचारधारा से प्रेरित एक आंदोलन है जो वास्तव में वहाबियत की आरंभिक विचारधारा से कई गुना अधिक कट्टर है। 

वैसे यह भी एक हक़ीक़त है कि हालिया दशकों में आतंकवादी संगठनों को बनाने में वहाबी विचारधारा की मुख्य भूमिका रही है और यह सब को मालूम है कि वहाबियत की विचारधारा का आरंभ ब्रिटिश एजेंट मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने किया था। मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने एकेश्वरवाद को पुनर्जीवन प्रदान करने के दावे के साथ इब्ने तैमिया के कट्टरपंथ पर आधारित विचारों का प्रचार व प्रसार किया। 

मुहम्मद अब्दुल वहाब

इब्ने तैमिया  ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के बहुत से विचारों का विरोध किया। इब्ने तैमिया इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार स्वयं को हंबली मुसलमान कहते थे लेकिन इस बात पर ज़ोर देते थे कि यहूदी किसी भी दशा में झूठ नहीं बोलते और न ही किसी चीज़ में फेर बदल करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने इस दावे के लिए यह दलील पेश की कि पैग़म्बरे इस्लाम ने यहूदियों का विरोध नहीं किया। वहाबियत ने भी इस विचार को अपनाया और इसी आधार पर वह ज़ायोनियों का समर्थन करती है। अमरीकी पत्रकार और लेखक स्टीवन कोल कहते हैं कि अब्दुलवहाब, मक्का की यात्रा करने वाले मुसलमानों का अपमान करते थे और पैग़म्बरे इस्लाम के दृष्टिगत इस्लामी संस्कारों के बजाए वह क़बाइली अरबों के संस्कारों को अधिक पसंद करते थे। 

सन 1795 में वहाबियों  ने सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ के नेतृत्व में पहले इराक़ के कर्बला नगर की घेराबंदी की और फिर नगर में घुस कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मज़ार के दर्शन के लिए इस नगर में मौजूद श्रद्धालुओं का जनसंहार किया । नगर में खूब लूट मार की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोज़े को तबाह कर दिया। वहाबियों ने अपनी पाश्विक युद्ध शैली और हिंसा के बल पर ताइफ़, मक्का, जद्दा, मदीना और हिजाज़ के लगभग सभी मुख्य नगरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस तरह से ब्रिटेन की साज़िश और सहयोग से हिजाज़, सऊदी अरब बन गया और वहाबियत ताकतवर होती चली गयी।  सन 1904 से 1919 तक फार्स की खाड़ी में ब्रिटेन के मशहूर और बेहद शक्तिशाली जासूस " सर पेर्सी कॅाक्स" ने सऊदी अरब के गठन में मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्होंने शाह अब्दुल मलिक को ट्रेंनिंग देने में भी अहम रोल अदा किया था और सऊदी अरब के राजनीतिक विभाजन  की ज़िम्मेदारी भी उन्ही की थी। हिजाज़ के शासक के रूप में अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुर्रहमान आले सऊद, और ब्रिटेन के प्रतिनिधि के रूप में सर कॅाक्स ने 26 दिसंबर सन 1915 को सात अनुच्छेदों पर आधारित एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके आधार पर  ब्रिटेन ने सऊदी अरब को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया और यह वादा किया ब्रिटेन हमेशा हर युद्ध में आले सऊद का साथ देगा। उस समय से आज तक सऊदी अरब पाकिस्तान व अफगानिस्तान सहित क्षेत्र में आतंकवादी संगठनों का समर्थन करता रहा है और उन्हें बनाता और ट्रेनिंग  देता रहा है।