लेबनान के अलमयादीन टीवी चैनल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हफ्ते के आरंभ में अमरीका की फेडरल अदालत ने हार्वड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चार्ल्ज़ लेबर और दो चीनी नागरिकों के खिलाफ मुक़द्दमे की सुनवाई शुरु की है। इन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने बायोलॉजिकल पदार्थों से भरे 21 पाइपों को गैर कानूनी तरीक़े से चीन ले जाने की कोशिश की थी।
चीन के सिलिसले में ट्रम्प सरकार ने जो नीति अपनायी है उसे देखते हुए भी इस विचार को बल मिलता है कि चीन में पैदा हुए कोरोना संकट के पीछे अमरीकी सरकार हो सकती है। इस दौरान चीन में बड़ी अजीब अजीब घटनाएं घट रही हैं और उन सब के पीछे अमरीका का हाथ रहा है। उदाहरण स्वरूप मार्च सन 2019 में कनाडा का जैविक पदार्थ चीन पहुंच गया जिसमें भयानक वायरस थे लेकिन कनाडा ने दावा किया कि यह खेप विश्व स्वास्थ्य में सहयोग के लिए भेजी गयी थी लेकिन जिस तरह से इस खेप के बारे में सूचनाओं को गुप्त रखा गया उसे देखते हुए चीन ने औपचारिक रूप से इस की शिकायत दर्ज करायी।
इसी तरह से 300 सदस्यों पर आधारित एक अमरीक प्रतिनिधिमंडल ने अक्तूबर सन 2019 में वूहान की यात्रा की थी इस यात्रा का उद्देश्य, चीन की मेज़बानी में मिलिट्री गेम फेस्टिवेल में हिस्सा लेना था। 19 अक्तूबर 2019 में यह प्रतिनिधिमंडल वूहान गया और 2 नंवबर 2019 में कोरोना वायरस का पहला केस सामने आ गया। कोरोना वायरस को सक्रिय होने में 14 दिनों का समय लगता है।
कोरोना वायरस का फैलाव चीन के लिए बहुत महंगा पड़ा है। इस देश में उड़ानें बंद हो गयी हैं, रेल गाड़ियां खड़ी हो गयी हैं और यह उस समय हुआ जब चीन में नये साल की वजह से लोग बहुत अधिक यात्रा करते हैं। वूहान से तो किसी को निकलने भी नहीं दिया जा रहा है। चीन में 5 दिनों में एक विशेष अस्पताल बनाया गया तो इन सब का नुक़सान चीन को हुआ है लेकिन फायदा किसे हुआ है? चीन ने कहा है कि अमरीका ने कोरोना वायरस से पूरी दुनिया में भय व आतंक को फैलाया तो बहुत है मगर उसे खत्म करने में चीन की कोई मदद नहीं की।