सूरे बक़रा की 62वीं आयत का अनुवाद इस प्रकार हैः निःसन्देह, जो लोग (विदित रूप से) ईमान लाए और इसी प्रकार यहूदी, ईसाई और साबेई (अर्थात सितारों की पूजा करने वाले) हैं उनमें से जो वास्तव में ईश्वर और प्रलय के दिन पर ईमान लाएंगे और भले कर्म करेंगे उन्हीं के लिए उनके पालनहार के पास प्रतिफल है और न तो उन्हें कोई भय होगा और न ही वे दुखी होंगे। आइए देखते हैं कि सूरे बक़रा की आयत संख्या 62 के उतरने की प्रष्ठभूमि क्या है? यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के एक महान सहाबी सलाम फ़ारसी से संबन्धित बताई जाती है।
सलमान फ़ारसी का अस्ली नाम "रूज़बे" था। उनके पिता का नाम "बदख़्शां" था। रूज़बे का जन्म अपने काल के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। कुछ लोगों का मानना है कि सलमान फ़ारसी का संबन्ध शीराज़ के "काज़रून" से था जबकि कुछ का मानना है कि उनका संबन्ध इस्फ़हान के किसी क्षेत्र से था। कुछ अन्य यह मानते हैं कि सलमान फ़ारसी का संबन्ध "रामेहरमज़" से था। रूज़बे अर्थात सलमान फ़ारसी के पिता बदख़्शां, ज़रतुश्ती धर्म के वरिष्ठ धर्मगुरू थे। सलमान फ़ारसी के पिता अपने काल के धनवान व्यक्ति थे। उनके पास काफ़ी ज़मीन-जायदाद थी। सलमान फ़ारसी की माता का देहांत उनके बचपन में हो गया था। उनके पिता अपने बेटे को बहुत चाहते थे। बदख़्शां, अपने बेटे रूज़बे को इतना अधिक चाहते थे कि वे उनको घर से बाहर जाने नहीं देते थे। उनको यह डर सताया करता था कि कहीं उनके बेटे को कोई परेशान न करे इसलिए वे उन्हें घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं देते थे। लंबे समय तक घर में रहने के कारण रूज़बे का दिल घर से उकता गया था। घर में अकेले रहने से रूज़बे के भीतर सोच-विचार करने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया।
बदख़्शां, अपने बेटे रूज़बे को धार्मिक शिक्षाएं देने का प्रयास करते रहते थे किंतु वे हमेशा इनको सीखने में आनाकानी करते थे। वे कहते थे कि ज़रतुश्ती धर्म में बहुत सी कुरीतियां हैं अतः इसे अपनाया नहीं जाना चाहिए। एक बार रूज़बे के पिता ने उनको घर से बाहर जाने की अनुमति दी। रूज़बे जब अपने घर से बाहर आए तो उन्होंने वहां पर गिरजाघर से आने वाली घंटे की आवाज़ को सुना जिसने उन्हें अपनी ओर आकृष्ट किया। थोड़ी देर के बाद रूज़बे गिरजाघर पहुंच गए। जब वे चर्च पहुंचे तो देखा कि पादरी वहां पर बैठा हुआ एक किताब पढ़ रहा है। रूज़बे ने ईसाई धर्मगुरू से पूछा कि तुम कौन सी किताब पढ़ रहे हो और इसमें क्या लिखा हुआ है।
ईसाई धर्मगुरू ने रूज़बे को बताया कि वह जिस किताब को पढ़ रहे हैं वह ईश्वर की किताब है। इस किताब में ईश्वरीय संदेशों का वर्णन है और धर्म के नियम इसमें बताए गए हैं। उसने रूज़बे को बताया कि इस धार्मिक किताब में अच्छे काम करने का आदेश है और बुरे कामों से बचने को कहा गया है। यह किताब इंजील है जो ईसा मसीह पर उतारी गई है। फिर ईसाई धर्मगुरू ने रूज़बे को अपने धर्म के बहुत से नियमों के बारे में बताया और उनकी व्याख्या की। ईसाई धर्मगुरू की बातों से रूज़बे बहुत प्रभावित हुए। इस प्रकार वे एक नए धर्म से अवगत हुए। रूज़बे ने जब ईसाई धर्मगुरू से यह पूछा की इस धर्म की उत्पत्ति कहां हुई तो उसने उनको बताया कि शाम में।
रूज़बे जब अपने घर वापस आए तो उनका चेहरा चिंता में डूबा हुआ था। जब रूज़बे के पिता ने अपने बेटे को चिंतित देखा तो वे स्वयं भी परेशान हो गए किंतु जब उनको यह पता चला कि उनका बेटा गिरजाघर गया था और उसके भीतर ईसाई धर्म के प्रति रुचि बढ़ी है तो उन्होंने रूज़बे पर घर से निकलने पर कड़ी पाबंदी लगा दी। हालांकि रूज़बे पर घर से निकलने पर प्रतिबंध लग चुका था किंतु उन्होंने घर में रहते हुए ईसाई धर्मगुरू तक यह संदेश पहुंचवाया कि जब भी कोई कारवां शाम जाए तो इसकी ख़बर वह उन्हें अवश्य कर दें। इस संदेश के कई दिनों के बाद रूज़बे को पता चला कि जल्द की एक क़ाफ़िला, शाम जाने वाला है। रूज़बे ने शाम जाने की पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही क़ाफ़िला शाम जाने लगा, रूज़बे चुपके से घर से निकलकर उसमें शामिल हो गए। जब वे शाम पहुंचे तो वहां पर उन्होंने ईसाइयों के बड़े धर्मगुरू से भेंट करके उनको पूरी कहानी सुनाई। रूज़बे ने उस ईसाई धर्मगुरू से कहा कि मैं आपके पास रहकर उपासना करना चाहता हूं। उनकी बात को धर्मगुरू ने स्वीकार कर लिया और रूज़बे अब उसके पास रहने लगे।
शाम में रहने वाला ईसाइयों का धर्मगुरू लालची और लोभी था। वह लोगों से दान-दक्षिणा एकत्रित करता और उसे ज़रूरतमंदों को देने के बजाए अपने पास रखता था। कुछ समय बाद उस लालची धर्मगुरू का निधन हो गया। लोगों ने उसके स्थान पर एक अन्य धर्मगुरू का चयन किया। पिछले लोभी धर्मगुरू की तुलना में नया वाला ईमानदार और सच्चा था। वह सांसारिक मायामोह से बहुत दूर था। उसकी इस विशेषता के कारण रूज़बे को उनसे बहुत लगाव हो गया। काफ़ी समय के बाद जब नेक ईसाई धर्मगुरू का भी देहान्त हो गया तो उससे पहले उसने रूज़बे को बता दिया था कि मेरे बाद तुम मूसिल चले जाना और वहां पर उस व्यक्ति से मिलना जिसकी निशानियां मैं तुमको बता रहा हूं।
इस ईमानदार धर्मगुरू की मौत के बाद रूज़बे ने मूसिल का रुख़ किया और बताई हुई जगह पर पहुंच गए। वहां पहुंचकर वे उसी व्यक्ति के पास गए जिसका पता उन्हें बताया गया था। काफ़ी समय तक रूज़बे, मूसिल में रहे। जब उस व्यक्ति की मौत का समय निकट आया तो उन्होंने रूज़बे को बताया कि मेरे बाद तुम "नसीबीन" शहर चले जाना और वहां पर उस व्यक्ति से मिलना जिसकी निशानियां मैं तुमको बता रहा हूं। रूज़बे की ज़िंदगी इसी प्रकार आगे बढ़ती गई। अंत में एक धर्मगुरू ने उनको अंतिम ईश्वरीय दूत के बारे में बताया। इस संबन्ध में उन्होंने कहा कि बेटा! मैं इस बारे में तो तुमको नहीं बता सकता कि एसा कौन है जो मेरे जैसा होगा किंतु मेरी यह बात याद रखो कि तुम एसे समय में जीवन गुज़ार रहे हो कि जब ईश्वर का अन्तिम दूत आने वाला है। ईश्वर का जो अन्तिम दूत आएगा उसकी बातें हज़रत इब्राहीम की शिक्षाओं पर आधारित होंगी। ईश्वर का अन्तिम दूत एसे स्थान पर प्रकट होगा जहां पर अधिकांश रेगिस्तान होगा और वहां पर पत्थर की चट्टाने होंगी। अब अगर तुम से हो सके तो स्वयं को उस स्थान पर पहुंचाने की कोशिश करो। उसकी एक निशानी यह है कि वह सदक़ा नहीं खाता किंतु उपहार को स्वीकार करता है। उनके कांधों पर नबूवत की मोहर होगी।
जारी है...