28 जनवरी 2020 - 20:20
क़ुरआनी क़िस्सेः क़ुरआन का सूरए दहर पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के बलिदान के कारण नाज़िल हुआ

इससे पहले हमने बताया कि सूरे अलइन्सान के नाज़िल होने की घटना इस प्रकार है कि हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा अलैहिमुस्सलाम के घर के सभी सदस्यों ने रोज़े रखे जब इफ़्तार का समय आया तो एक भिखारी आ गया और उसने आवाज़ लगाई।

मैं एक दरिद्र हूं मुझे कुछ खाने के लिए कुछ दे दो। रोज़ा रखने वाले सभी लोगों ने अपने हिस्से की रोटी उस भिखारी को दे दी और सिर्फ़ पानी पीकर सो गए।  अगले दिल यही घटना फिर हुई। इस बार एक अनाथ को अपने हिस्से की रोटियां दे दीं। इस बार भी सबने पानी से ही इफ़्तार किया और सो गए।  तीसने दिन भी सभी ने रोज़ा रखा। उस दिन भी इफ़्तार के समय एक बंदी घर के पास आया और उसने कुछ खाने के लिए मांगा। सबने फिर अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी।

ईश्वर को हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के घर का यह त्याग बहुत पसंद आया। ईश्वर ने क़ुरआन में इसकी प्रशंसा की और इस बारे में क़ुरआन का एक सूरा नाज़िल किया जिसे सूरए दहर या सूरए इंसान कहा जाता है।

अगले दिन जब पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर आए तो उन्होंने सबके कुम्हलाए हुए चेहरे देखे तो उन्हें बहुत दुख हुआ।  पैग़म्बरे इस्लाम ने सबको भूख से कांपते हुए देखा तो कहा कि तुम लोगों को इस स्थिति में देखना मेरे लिए अत्यंत कठिन है। 

इसके बाद वे उठे और उनके साथ घर पहुंचे। जब वे घर के अंदर पहुंचे तो देखा कि हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा नमाज़ पढ़ रही हैं जबकि भूख के कारण उनका पेट, पीठ से लग गया था और उनकी आंखें अंदर की ओर धंसी हुई थीं।  इस दृश्य को देखकर पैग़म्बर बहुत दुखी हुए।  उसी समय ईश्वर के विशेष दूत हज़रत जिब्रईल आए और उन्होंने कहाः हे मुहम्मद इस प्रकार के परिजनों पर ईश्वर आपको बधाई देता है। इसके बाद उन्होंने पैग़म्बर के परिजनों की सराहना में सूरए इंसान को उनके समक्ष पढ़ा जिसका कुछ भाग इस प्रकार हैः यह वे लोग हैं जो मन्नतें पूरी करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी सख्ती हर तरफ़ फैली होगी। यह लोग उसकी मोहब्बत में मोहताजों, यतीमों और बंदियों को खाना खिलाते हैं।  वे कहते हैं कि हम तो तुमको बस केवल ख़ुदा के लिए खिलाते हैं। हम न तुम से बदले के इच्छुक हैं और न ही आभार चाहते हैं।  हमको तो अपने पालनहार से उस दिन का डर है जिसमें चेहरों पर हवाइयाँ उड़ती होंगी। 

यह घटना 25 ज़ीक़ादा, छठी या सातवीं हिजरी की है।  इस्लाम की सभी प्रमुख किताबों में मिलता है कि सूरे दहर या अलइन्सान, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की प्रशंसा में नाज़िल हुआ था।  प्रसिद्ध लेखक अल्लामा अमीनी ने सुन्नी मुसलमानों के 34 धर्मगुरूओं का उल्लेख करते हुए बताया है कि इन सभी का मानना है कि यह सूरा, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के बलिदान के कारण नाज़िल हुआ।  हालांकि इस सूरे की आयतों में आम नेक लोग भी शामिल हैं।  सूरे दहर के नाज़िल होने के बारे में इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यह सूरा,  इमाम अली,  हज़रत फ़ातेमा ज़हरा,  इमाम हसन और हुसैन तथा जनाब फ़िज़्ज़ा के निष्ठापूर्ण बलिदान के संबंध में उतारा गया। वे आगे कहते हैं कि यह सूरा उन सभी मोमिनों के लिए है जो इस प्रकार के काम करते हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जो भी ईश्वर से कोई वादा करे और उसको पूरा करे और उस चीज़ को जिसे वह पसंद करता है ईश्वर के मार्ग में दान दे तो एसा व्यक्ति भी भले लोगों की सूचि में शामिल हो सकता है। पवित्र क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर कहता है कि हे लोगो! जब तक तुम अपनी पसन्दीदा चीज़ों में से कुछ ईश्वर के मार्ग में ख़र्च न करोगे तब तक हरगिज़ नेकी के दरजे तक नहीं पहुंच पाओगे और तुम जो चीज़ भी ख़र्च करो ख़ुदा उसको ज़रूर जानता है। इसीलिए कहा जाता है कि ईश्वर के निकट जो चीज़ महत्वपूर्ण है वह काम की गुणवत्ता है।  कोई भी काम कितना ही अधिक क्यों न हो जबतक उसमें निष्ठा नहीं है तबतक वह ईश्वर के निकट स्वीकार्य नहीं है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम और उनके परिवार के सदस्यों ने जो परोपकार किया वह मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों की दृष्टि से उच्च स्तरीय था।  इस प्रकार के परोपकार के बाद उन्हें दूसरों की प्रशंसा की कोई कामना नहीं थी।  उन्होंने भूखे रहने के बावजूद अपनी भूख को अनदेखा करते हुए दूसरों की भूख को प्राथमिकता दी।  हालांकि उन्हे स्वयं भोजन और खाने की आवश्यकता थी किंतु उन्होंने भूखे रहते हुए दूसरों की भूख को महत्व दिया और अपना खाना उनके हवाले कर दिया।  यही कारण है कि ईश्वर ने उनपर हलअता या अलइन्सान सूरा नाज़िल किया जिसके कारण वे बाद वालों के लिए आदर्श बन गए।