कोर्ट के आदेश के बाद, दिल्ली पुलिस ने शाहीन बाग़ में पिछले एक महीने से भी ज़्यादा समय से जारी धरने को ख़त्म कराने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया है।
हालांकि धरने पर बैठी महिलाओं का कहना है कि ट्रैफ़िक की समस्या ख़ुद पुलिस ने पैदा की है, इसलिए कि उनका धरना दिल्ली-नोएडा हाईवे के एक ओर और केवल 150 मीटर में सीमित है, जबकि हाईवे की दूसरी साइड पुलिस ने बैरिकेड लगाकर ख़ुद ही ट्रैफ़िक के लिए बंद कर दी है।
लोगों का यह भी कहना है कि जस तरह से एम्बुलेंसों के गुज़रने के लिए रास्ता दिया जा रहा है, उसी तरह से स्कूल बसों के लिए भी रास्ता दिया जा सकता है, लेकिन सरकार का कोई नुमाइंदा तो उनकी मांगे सुनने और उनसे बात करने के लिए धरना स्थल पर पहुंचे।
धरने पर बैठी 30 वर्षीय हिना अशरफ़ का कहना है कि हम यहां करोड़ों लोगों के बुनियादी मानव अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसके बावजूद अगर ट्रैफ़िक की समस्या है तो उसका समाधान निकलाने के लिए तैयार हैं, लेकिन धरना उस वक़्त तक ख़त्म नहीं करेंगे, जब तक कि काले क़ानून सीएए को वापस नहीं लिया जाता है।
उन्होंने सवाल किया कि जब लोग अपनी पहचान और नागरिकता जैसे बुनियादी हक़ के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो क्या आपको यह उम्मीद है कि किसी तरह की कोई असुविधा नहीं हो। और क्या कुछ लोगों की ट्रैफ़िक समस्या लोगों को पेश आने वाली बड़ी आज़माइश से ज़्यादा अहम है? धरने पर बैठी महिलाओं से यात्रियों के बारे में सोचने की उम्मीद क्यों की जा रही है, ऐसे वक़्त में जब आप एक पूरे समुदाय के लिए पेश आने वाले ख़तरे, अपमान और बुनियादी अधिकारों के छीन लिए जाने के बारे में नहीं सोच सकते हैं? क्या हमारी ट्रैफ़िक की सुविधा संविधान की रूह को तार तार कर दिए जाने से अधिक महत्वपूर्ण है?
शाहीन बाग़ और उसकी जागरुक और बहादुर औरतों ने कड़ाके की ठंड, अपमान, आलोचना और धमकियों की परवाह किए बिना आगे बढ़ते रहने का संकल्प लिया हुआ है। आज यह औरतें इस देश के इतिहास के सबसे नाज़ुक दौर में सबसे ताक़तवर शक्ति का प्रतीक बन गई हैं।
शाहीन बाग़ सभी धर्मों के मानने वालों और हर वर्ग के लोगों की आवाज़ बन चुका है। यह एक ऐसी मशाल है, जिससे देश में सैकड़ों मशालें रौशन हो चुकी हैं। इसलिए हर मशाल की लौ में इसका वजूद पीड़ितों को उजाला देता रहेगा और देश में मौजूद अंधकार का ख़ात्मा करके रहेगा।