सूरए ताहा की आयत क्रमांक 95 और 96 का अनुवादः
(मूसा ने) कहाः हे सामेरी! तेरा क्या मामला है? (तूने यह कार्य क्यों किया) उसने कहा! मुझे कुछ ऐसी बातों का ज्ञान हुआ जिनसे वे अनभिज्ञ थे तो मैंने पैग़म्बर के पद-चिन्ह (वाली मिट्टी) में से एक मुट्ठी उठा ली फिर उसे (बछड़े की मूर्ति में) डाल दिया और मेरे मन ने इस प्रकार (इस बुरे कर्म को) सजा कर मुझे धोखा दिया।
संक्षिप्त टिप्पणी:
सामेरी ने उत्तर में कहा कि मैं आरंभ में ईश्वर के पैग़म्बर के रूप में आप पर ईमान लाया, यहां तक कि मुझे कुछ ऐसी वास्तविकताओं का पता चल गया जिनसे दूसरे लोग अनभिज्ञ थे किंतु मैं अपनी आंतरिक इच्छाओं में ग्रस्त हो गया और जो कुछ मैंने सीखा था उसे भुला दिया।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
- समाज के नेताओं को अत्यधिक सचेत रहना चाहिए क्योंकि सामेरी जैसे लोगों की ओर से बहुत अधिक ख़तरा लगा रहता है जो लोगों को पथभ्रष्ट कर देता है।
-
आंतरिक इच्छाएं कभी कभी लोगों के ईमान को समाप्त कर देती हैं।
3. आंतरिक इच्छाओं का पालन एक पूरे गुट या एक पूरी जाति की पथभ्रष्टता का भी कारण बन सकता है।
4.जो अपनी इच्छाओं से धोखा खा जाता है वह दूसरों को भी धोखा दे सकता है।