मंगलवार को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी स्वयं सेवी बलों की वर्दी पहने हुए थे और उन्होंने अमरीकी दूतावास पर हिज़्बुल्लाह का झंडा फहरा दिया।
पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन के व्यापक समर्थन और 2003 में सद्दाम को हटाने के बहाने इराक़ पर क़ब्ज़े के कारण इस अरब देश में अमरीका विरोधी भावनाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं।
इराक़ जनता के कड़े प्रतिरोध के कारण, 2011 में अमरीका इस देश से अपने सैनिकों को बाहर निकालने पर मजबूर हो गया था, लेकिन 2014 में आतंकवादी गुट दाइश के उभरने के साथ ही आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में इराक़ी सरकार की मदद के बहाने अमरीका ने फिर से इस देश की धरती पर अपने पंजे गाड़ दिए।
बग़दाद स्थित अमरीकी दूतावास की इमारत क़रीब 104 एकड़ (42 हेक्टेयर) पर फैली हुई है और यह दुनिया का सबसे बड़ा दूतावास है। इस दूतावास में एक सैन्य अड्डा भी बनाया गया है, जिसमें 5,000 से अधिक अमरीकी सैनिक तैनात हैं।
यह दूतावास, सद्दाम के एक पूर्व महल में बनाया गया है, जिसे इराक़ी जनता आज भी अपनी ग़ुलामी का प्रतीक समझती है। लोगों का मानना है कि लगातार लड़ाईयों, आतंकवाद के विस्तार और देश की ख़राब स्थिति के लिए अमरीका ज़िम्मेदार है।
"अमरीका मुर्दाबाद" और "इस्राईल मुर्दाबाद" के नारे लगाते हुए मंगलवार को प्रदर्शनकारियों ने अमरीकी दूतावास को घेर लिया और इमारत के दो प्रवेश द्वारों को आग के हवाले कर दिया।
एपी की रिपोर्ट के मुताबिक़, अमरीका ने अपने अधिकांश कूटनयिकों को दूतावास के पिछले दरवाज़े से और हेलिकॉप्टरों द्वारा बाहर निकाल लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इराक़ी स्वयं सेवी बलों पर बमबारी करके अमरीका एक बहुत बड़ी रणनीतिक ग़लती कर बैठा है, जिसके बाद उसे कड़े प्रतिरोध का सामना कर सकता है और यह उसके इराक़ से निकलने का कारण बन सकता है।
रूसी विशेषज्ञ ग्रीगोरी लूकानोव का मानना है कि बग़दाद में अमरीकी दूतावास को वही हाल हो सकता है, जो 1979 की ईरान की क्रांति के बाद तेहरान स्थित दूतावास का हुआ था।
तेहरान स्थित अमरीकी दूतावास पर छात्रों ने निंयत्रण करके 52 अमरीकी राजनयिकों को 444 दिन बंधक बनाकर रखा था, जिसके बाद से आज तक अमरीका और ईरान के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं।