2002 में गुजरात में बीजेपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री व वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में मुसलमानों का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया था और अब उन्ही के नेतृत्व में धर्म के आधार पर मुसलमानों को अलग-थलग करने और फिर... की क़वायद चल रही है।
इन दोनों घटनाओं के बीच समानता यह है कि दोनों एक ही व्यक्ति के नेतृत्व में भारतीय मुस्लिम नागरिकों के ख़िलाफ़ अंजाम दी गईं।
16 दिसम्बर को अमरीका की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आज़ादी के कमीशन (USCIRF) ने सीएए और एनआरसी को भेदभाव वाला बताते हुए इसका विरोध करने वालों पर पुलिस की बर्रता की निंदा की थी। इसके बाद अमरीकी कांग्रेस की स्वतंत्र शोध इकाई सीआरएस ने भी चेतावनी दी थी कि नागरिकता क़ानून को अगर नेश्नल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस (एनआरसी) के साथ जोड़ा जाता है तो भारत में मुसलमानों की स्थिति हमेशा के लिए बदल जाएगी।
दूसरी ओर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस भेदभाव वाले क़ानून के ख़िलाफ़ व्यापक विरोध के बाद, प्रधान मंत्री मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह अपने बयान तो बदल रहे हैं, लेकिन साथ ही वे अपने समर्थक कट्टरपंथी हिंदुओं को यह संदेश भी दे रहे हैं कि उनकी सरकार राष्ट्रीय स्वयं सेवल संघ (आरएसएस) के एजेंडे से एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी।
उनका यह संदेश बहुत स्पष्ट है कि हिंदुस्तान, केवल ऊंची जाती के हिंदुओं के लिए है, उसके अलावा हर कोई दूसरे दर्जे का नागरिक है, ख़ास तौर से मुसलमानों के लिए हिंदू राष्ट्र में कोई जगह नहीं है।
ऐसे वक़्त में जब मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार मुसलमानों को ठिकाने लगाने के लिए नीतियां बना रही है, मुस्लिम जगत ने भारतीय मुसलमानों की ओर से आँखें मूंद ली हैं, गोया उनका इस संकट से कोई लेना-देना नहीं है।
भारत ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ वही खिचज़ी पकानी शुरू कर दी है, जिसकी रेसिपी इस्राईल ने तैयार की है और वह ख़ुद इसे दशकों से पका रहा है। मोदी शासनकाल में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत को आम कर दिया गया है। मुसलमानों की मॉब लिंचिग करना, मारपीट कर उनसे जय श्री राम का नारा लगवाना और बात बात पर उन्हें पाकिस्तान भेज देने की धमकी देना एक सामान्य सी बात बनती जा रही थी।
ब्रसेल्स स्थित शोधकर्ता शीरी मलहोत्रा का कहना है कि भारत में 'इंटरनेटी हिंदू' इस्राईल के सबसे बड़े प्रशंसक हैं। फ़िलिस्तीनियों और पड़ोसी देशों के साथ इस्राईल के व्यवहार से वे बड़े ख़ुश होते हैं। उन्हें लगता है कि इस्राईल से मुसलमान डरते हैं और इस्राईल का अनुसरण करके ही अपने देश के मुसलमानों का भी दमन किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश में प्रशिक्षण प्राप्त आरएसएस और उससे जुड़े अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा मुसलमानों के घरों पर आधी रात को छापे मारना, घरों को लूटना, घर वालों के साथ मारपीट करना, उन्हें डराना धमकाना, युवाओं को उठाकर ले जाना और उनके हाथ पैर तोड़ देना भविष्य में उनके साथ होने वाले बर्ताव की सिर्फ़ एक आहट भर है।
हालांकि हक़ीक़त यह है कि इस्राईली पैटर्न पर मुसलमानों का दमन करने की योजना बनाने वालों को विश्व और ख़ास तौर पर मध्यपूर्व में तेज़ी से बदल रहे शक्ति के संतुलन का सही अंदाज़ा नहीं है या वे जानबूझकर सच्चाई जानना नहीं चाहते। पिछले 70 वर्षों से फ़िलिस्तीनियों पर हर प्रकार के अत्याचार करने वाला इस्राईल, आज फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधी गुटों के सामने बेबस नज़र आ रहा है और ग़ज्ज़ा से फ़ायर होने वाले एक रॉकेट की आवाज़ सुनकर ही उसके प्रधानमंत्री भाषण बीच में छोड़कर भाग खड़े होते हैं।
इसके अलावा, भारतीय मुसलमानों की 1940 के दशक के फ़िलिस्तीनियों से तुलना नहीं की जा सकती। भारत में 20 करोड़ से अधिक मुसलमान बसते हैं, जो विश्व समुदाय से पूरी तरह से जुड़े हुए हैं। अगर उनकी स्थिति में कोई बदलाव आता है तो पूरा भारत इससे अछूता नहीं रह सकता। अगर उन्होंने सिर्फ़ नागरिक अवज्ञा का एलान कर दिया तो पूरा मुल्क बैठ जाएगा। यह बात आम हिंदू भी समझता है, इसीलिए वह सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ हिंदुत्व सरकार के मुक़ाबले में मुसलमानों के कांधे से कांधा मिलाकर चल रहे हैं।