नागरिक स्वतंत्रता के लिए काम करने वाली संस्था पीयूडीआर के सदस्यों ने जामिया विश्वविद्यालय में जाकर स्थिति का जायज़ा लिया और एक रिपोर्ट तैयार की है। उस रिपोर्ट के मुताबिक़ वहां पुलिस ने विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों सहित ऐसे छात्रों को भी अपनी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की निशाना बनाया है जो या लाइब्रेरी में केवल पढ़ाई कर रहे थे या अपने हॉस्टल में लेटे हुए थे। जांच में यह बात भी सामने आई है कि, भारत सरकार के बनाए गए नए विवादित क़ानून सीएए से असहमत आवाज़ों को दबाने के लिए क़ानून की रक्षा करने की जगह ख़ुद क़ानून तोड़ने वाली शक्ति की तरह दिल्ली पुलिस ने काम किया और छात्रों को अपंग कर देने या अधिकतम नुक़सान पहुंचाने के उद्देश्य से उन्हें पीटा और गंभीर चोटें पहुंचाई हैं।
इस बीच कई अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय मानवाधिकार संगठनों ने मोदी सरकार द्वारा बनाए गए नए विवादित नागरिकता क़ानून पर पूरे भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को दबाने के लिए भारत के कई हिस्सों में पुलिस की कार्रवाई पर प्रश्न चिन्ह लगाया है। प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्यवाही के कई वीडियो और तस्वीरें मीडिया और अन्य साधनों से प्रकाश में आने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ सहित अन्य अंतर्राष्ट्रीय व भारतीय संगठनों ने गंभीर चिंता भी व्यक्त की है। पीयूडीआर ने दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय में 15 दिसंबर को पुलिस कार्रवाई की वास्तविकता जानने के लिए एक फ़ैक्ट-फाइंडिंग मिशन चलाया है। इस मिशन के तहत कई छात्रों, शिक्षकों, स्टाफ़ सदस्यों, डॉक्टरों, अभिभावकों, स्थानीय निवासियों और प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत की गई है। गुरुवार को नई दिल्ली में पीयूडीआर ने अपनी रिपोर्ट जारी की। पीयूडीआर का कहना है कि16 से 19 दिसंबर तक चार दिन तक पड़ताल करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है।
पीयूडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 दिसंबर से पहले 13 दिसंबर को भी पुलिस ने छात्रों के एक मार्च को रोकने का प्रयास किया था और छात्रों पर लाठियां बरसाईं, आंसू गैस छोड़ी और विश्वविद्यालय के परिसर के अंदर और आस-पास सार्वजनिक संपत्तियों का नुक़सान किया। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस पहले ही जामिया के छात्रों के ख़िलाफ़ अत्यधिक बल के उपयोग के आरोपों को खारिज कर चुकी है। दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी एमएस रंधावा का कहना है पुलिस ने किसी छात्र पर गोली नहीं चलाई थी और स्थिति को क़ाबू में लाने के लिए न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि उन प्रदर्शनों में लगभग 30 पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे, जिनमें एसीपी और डीसीपी स्तर के अफसर भी शामिल थे। वहीं पीयूडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम से कम 400 आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया गया और गोलियां भी चलीं। अस्पतालों में घायलों की चोटों में गोलियों के घाव स्पष्ट हैं, इसके अलावा रिपोर्ट में लिखा है कि यह भी स्पष्ट है कि मारपीट के पीछे उद्देश्य अपंग कर देना या अधिकतम नुक़सान पहुंचाना था।
रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली पुलिस ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से परिसर में घुसी, ताले तोड़े, गार्डों को पीटा, सीसीटीवी कैमरे तोड़े और फिर वही अंधाधुंध लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। पुलिस पर लाइब्रेरियों, मस्जिदों, शौचालयों और बगीचों में घुस कर उन छात्रों को बेरहमी से पीटने के आरोप हैं जो प्रदर्शन में शामिल भी नहीं थे। पीयूडीआर ने मांग की है कि एक जांच आयोग बनाया जाए जो दिल्ली पुलिस के 'अनाधिकृत, अनुचित और अत्यधिक शक्ति के इस्तेमाल' की जांच करे। साथ ही कई संगठनों ने वीडियो और फ़ोटो द्वारा ऐसे बहुत से लोगों को चिन्हित किया है जो दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ लाठी और हथियारों से लैस थे और उनका संबंध न दिल्ली पुलिस से था और न ही उत्तर प्रदेश पुलिस से, बल्कि उनका संबंध कट्टरपंथी हिन्दू संगंठनों से है और उन्होंने आम लोगों के घरों में घुसकर लूटपाट भी किया है।