22 दिसम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण और एनआरसी और डिटेंशन कैम्पों को एक अफ़वाह और सरासर झूठ क़रार देने के बाद कुछ लोगों का मानना है कि सरकार को इतने बड़े पैमाने पर रिएक्शन की उम्मीद नहीं थी, इसलिए अब वह धर्मसंकट में पड़ गई है और क़दम पींछे खींच रही है।
लेकिन ऐसा मानने वाले इस मुद्दे को शायद सिर्फ़ सियासी नफ़ा और नुक़सान की नज़र से देख रहे हैं और वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की विचारधारा और काम करने की शैली से वाक़िफ़ नहीं हैं या ख़ुशफ़हमी में हैं या जानबूझकर उसे नज़र अंदाज़ कर रहे हैं।
आरएसएस का सपना भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना है, हालांकि उसके नेताओं का दावा है कि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है, जिसकी सीमाएं ईरान से लेकर इंडोनेशिया तक हैं, सिर्फ़ हमें उसका पुनरुत्थान (revival) करना है। आरएसएस की पाठशालाओं में हर रोज़ जो प्रार्थना होती है, उसमें कहा जाता हैः ''वयम् हिंदू राष्ट्रांग भूता: हम सभी 'हिंदू राष्ट्र' का हिस्सा हैं।''
आरएसएस अपने रास्ते में दो बड़ी रुकावटें देखता है। एक आंतरिक रुकावट और दूसरी बाहरी रुकावट। आरएसएस पहले आतंकरिक रुकावट को दूर करने पर बल देता है और उसकी नज़र में देश के अल्पसंख्यक ख़ास तौर से मुसलमान सबसे बड़ी आंतरकि रुकावट हैं।
आरएसएस के सामने 20 करोड़ मुसलमानों के डिसपोज़ल या उन्हें रास्ते से हटाने की चुनौती है। अब इस मॉडर्न ज़माने में वह इतनी बड़ी आबादी को रास्ते से हटाने के लिए मानव इतिहास में किए गए किसी भी नस्लीय सफ़ाए को आदर्श के रूप में नहीं अपना सकता है। इसलिए उसने इसके लिए कई विकल्पों को चुना है। उसमें सबसे अहम विकल्प 130 करोड़ भारतीयों की सिर्फ़ एक पहचान, ''हिंदू पहचान'' और एक समाज सिर्फ़ ''हिंदू समाज'' पर ज़ोर देना है।
दूसरे विकल्प के रूप में मुसलमानों को तितर-बितर (disperse) करना है। इसके लिए नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे क़ानून पारित करना और देश भर में एनआरसी लागू करना है। इसके अलावा, गृह युद्ध छेड़ना और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर जनसंहार करना है। साथ ही बेघर और बेसहारा होने वाले मुसलमानों का सामूहिक रुप से धर्म परिवर्तन कराना और उन्हें हिंदू बनाना है।
डिटेंशन कैम्पों का निर्माण भी केवल एनआरसी से छूट जाने वाले मुसलमानों को वहां ज़िंदगी भर बंद करके रखना और उन्हें बिरयानी खिलाना नहीं है। डिंटेशन कैम्पों में बंद डरे-सहमे और हर तरफ़ से ना-उम्मीद हो चुके लोगों का ब्रेन वाश करना और उन्हें हिंदू बनाकर फिर से उनकी समाज में वापसी कराना है।
जब इस योजना को व्यवहारिक बनाया जाएगा तो निश्चित रूप से पड़ोसी मुस्लिम बहुल देशों में बसने वाले करोड़ो हिंदुओं पर दबाव पड़ेगा, जिसके लिए नया नागरिकता क़ानून बनाकर पहले से ही समाधान खोजने का प्रयास किया गया है।
इन तमाम तथ्यों को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली के रामलीला मैदान से अगर यह एलान करते हैं कि एनआरसी सफ़ेद झूठ है, तो वे केवल वक़्त ले रहे हैं और घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव में आकर रणनीतिक रूप से लोगों को भ्रम में डाल रहे हैं, हालांकि इसी के साथ फ़ौरन ही उनकी सरकार देश में एनपीआर लागू करने का एलान कर देती है, जो एनआरसी पर अमल करने के लिए सबसे पहला और अहम क़दम है।
इससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह अपने एजेंडे से नहीं हट रहे हैं, बल्कि हालात को देखते हुए सिर्फ़ अपनी रणनीति बदल रहे हैं। वैसे भी आरएसएस और बीजेपी का यह मानना है कि अगर 2024 तक उन्होंने अपने इस एजेंडे पर अमल नहीं किया तो कहीं उन्हें फिर अगले 100 साल तक इंतेज़ार न करना पड़े या फिर कभी ऐसा मौक़ा ही न मिले।