ओआईसी के महासचिव युसूफ़ बिन अहमद बिन अब्दुल रहमान ने इस बयान में कहा है कि ''भारत में मुसलमानों को प्रभावित करने वाले हालिया घटनाक्रमों पर हम क़रीब से नज़र रखे हुए हैं। नागरिकता के अधिकार और बाबरी मस्जिद केस को लेकर हमारी चिंताएं हैं। हम फिर से इस बात को दोहराते हैं कि भारत में मुसलमानों और उनके पवित्र स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।''
ग़ौरतलब है कि ओआईसी सऊदी अरब के वर्चस्व वाला 57 मुस्लिम देशों का संगठन है, जिसने अपने क़रीब 50 साल के इतिहास में विश्व में मुसलमानों से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण समस्या का कोई समाधान पेश नहीं किया है।
इसका मुख्यालय सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में स्थित है।
मुस्लिम जगत में जब भी कोई बड़ा संकट उत्पन्न हुआ है, इस संगठन ने ख़ुद को उससे दूर ही रखा है और यह संगठन मुसलमानों और मुस्लिम देशों के हितों की हिफ़ाज़त के बजाए अमरीका और उसके सहयोगियों के हितों की अधिक चिंता करता रहा है।
लेकिन, हाल ही में तुर्की, मलेशिया, पाकिस्तान और ईरान के नेताओं की पहल पर दुनिया भर के मुसलमानों की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं पर विचार करने के लिए कुआलालंपुर समिट के आयोजन से सऊदी अरब को यह ख़तरा महसूस हुआ कि कहीं मुस्लिम देश ओआईसी के समानांतर कोई नया संगठन खड़ा न कर दें।
यही वजह है कि न केवल सऊदी अरब ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया, बल्कि पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान ख़ान को भी रियाज़ बुलाकर इसमें भाग नहीं लेने के लिए दबाव डाला।
इसमें कोई शक नहीं है कि सऊदी अरब जब तक अमरीका के दबाव में है, मुस्लिम जगत से जुड़े मुद्दे कभी भी उसकी प्राथमिकता नहीं बन सकते।
हालांकि मलेशिया के प्रधान मंत्री महातिर मोहम्मद ने सऊदी अरब को भरोसा दिलाने की काफ़ी कोशिश की थी कि कुआलालंपुर समिट दुनिया में रोहिंग्या मुसलमानों के नस्लीय सफ़ाए जैसे मुद्दों पर विचार के लिए आयोजित किया जा रहा है और हमारा उद्देश्य किसी संगठन को प्रभावित करना नहीं है, लेकिन सऊदी अरब ने सबकुछ अनसुना कर दिया।
अब जब सऊदी अधिकारियों को इस ख़तरे का आभास हुआ कि अगर मुस्लिम जगत से संबंधित मुद्दों पर उनकी ठंडी प्रक्रिया इसी तरह जारी रही तो मुसलमानों के बीच वह अधिक अलग थलग पड़ जाएगा, इसलिए भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर ओआईसी ने यह प्रक्रिया ज़ाहिर की है।
हालांकि इससे पहले सऊदी अरब ने कश्मीर से जुड़े आर्टिकल 370 को ख़त्म करने के मोदी सरकार के क़दम का भरपूर समर्थन किया था।
अब वक़्त आ गया कि मुस्लिम देश ओआईसी जैसे निष्क्रिय संगठनों का बोझ ढोना बंद करें और एकजुट होकर एक ऐसा मंच तैयार करें कि जो दुनिया भर में मुसलमानों के हितों का प्रभावशाली रूप से बचाव कर सके और उन्हें आपस में बांटने और उनके ख़िलाफ़ नफ़रत पैलाने की साज़िशों का मुक़ाबला कर सके।