मलेशिया की राजधानी में शुरु होने वाला कुआलालंपुर इस्लामी शिखर सम्मेलन में 6 इस्लामी देशों के प्रमुख भाग ले रहे हैं। यह सम्मेलन, एक नये इस्लामी संगठन की नींव डालने, इस्लामी कांफ्रेंस संगठन ओआईसी का विकल्प खोजने और छोटी बड़ी अरब सरकारों को किनारे लगाने की कोशिश है। इस सम्मेलन में सऊदी अरब, मिस्र, मोरक्को, सूडान, अल्जीरिया, सीरिया, और इराक़ जैसी छोटी बड़ी अरब सरकारों को दूर रखा गया है और उन्हें निमंत्रण तक नहीं दिया गया। हम फिलहाल इस पर चर्चा नहीं करना चाहते कि इस सम्मेलन के संस्थापकों में शामिल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने सम्मेलन में क्यों भाग नहीं लिया? शायद इसकी वजह आर्थिक मजबूरी हो सकती है। भले ही पाकिस्तान के भाग न लेने से यह संगठन एक परमाणु शक्ति संपन्न सदस्य से वंचित हो गया हो लेकिन ईरान के राष्ट्रपति के भाग लेने की वजह से सम्मेलन पर सांप्रदायिकता का दाग़ नहीं और यह सम्मेलन शिया सुन्नी एकता का प्रतीक बन गया है।
कुआला लंपुर सम्मेलन में 6 देश शामिल हो रहे हैं जिनमें से 5 देशों में गैर अरब मुसलमानों की की भारी जनसंख्या रहती है जो मिल कर 600 मिलयन सदस्यों पर आधारित संगठन बनाते हैं। इन देशों का कुल क्षेत्रफल 6 मिलयन वर्गकिलोमीटर है। तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगान के सलाहकार यासीन अक़ताय का कहना है कि इन सभी देशों की संयुक्त विशेषता यह है कि उनकी अर्थ व्यवस्था, प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित नहीं है।
तुर्की के राष्ट्रपति के सलाहकार का कहना है कि जब दुनिया में या इस्लामी जगत में कोई खतरा होता है तो यह अरब नेता कहीं नज़र नहीं आते लेकिन इस्लामी जगत के खिलाफ घृणा फैलाने में वह सक्रिय नज़र आते हैं और उनका हर क़दम इस्लाम के लिए खतरे बढ़ाता है।
मिस्टर अक़ताय का यह बयान कड़वा है लेकिन सच्चाई पर आधारित है। आज अरब इस्लामी केन्द्र, अपने बेहद खराब दौर से गुज़र रहा है, भेदभाव, एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र, तानशाही, पश्चिमी साम्राज्यवाद विशेष अमरीकी आदेशों के पालन और इस्राईल जैसे दुश्मन के चापलूसी जैसे संकटों से गुज़र रहा है।
अपने देश की अर्थ व्यवस्था को विकास की राह पर सफलता के साथ डालने वाले मलेशिया के राष्ट्रपति डाक्टर महातीर मुहम्मद ने अपने देश में एक भी इस्राईली को क़दम नहीं रखने दिया। उनका कहना है कि यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है कि जब पूरी दुनिया में मुसलमानों का दमन किया जा रहा है, मुसलमानों को आतंकवादी कहा जा रहा है, इस्लाम से डराया जा रहा है और सब पर स्पष्ट है कि हालात खराब ही होंगे।
कुआला लंपुर सम्मेलन के खिलाफ अरबों को इलेक्ट्रानिक युद्ध छेड़ने और अपने अतीत का गुण गाने के बजाए अपनी हालत पर विचार करना चाहिए और सब से पहले यह काम सऊदी अरब को करना चाहिए जहां पवित्र इस्लामी स्थल हैं। अगर सऊदी अरब इस्लामी जगत का नेतृत्व अपने पास बाकी रखना चाहता है तो उसे यमन युद्ध, अमरीका के आदेशों का पालन करने जैसी अपनी अधिकांश नीतियों पर पुनर्विचार करना और इस्लामी जगत के मोर्चे में खड़े होकर फिलिस्तीनी जैसे इस्लामी मुद्दों का बचाव करना चाहिए।
जिस देश को इस्लामी जगत का अगुवा बनने का शौक हो उसके लिए ज़रूरी है कि वह सभी क्षेत्रों में एक शक्ति हो, विकास में, प्रजातंत्र में, मानवाधिकारों की रक्षा में, सामाजिक न्याय में, आपसी सौहार्द में, देश की संप्रभुता में और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में आगे हो, मुसलमानों में एकता का प्रयास करे।
कुआला लंपुर सम्मेलन सभी अरब मुस्लिम नेताओं के लिए खतरे की घंटी है और विशेष कर सऊदी अरब के लिए। शायद वह नींद से जाग जाए और अपनी नीतियों पर पुनर्विचार कर ले क्योंकि आज आईआईसी की अनदेखी कर दी गयी है तो कल संभव है पवित्र इस्लामी स्थलों की देख रेख की मांग भी इस्लामी जगत में उठ जाए और इस संदर्भ में इस तरह की बातें हो भी रही हैं। क्वालालमपुर तो केवल शुरुआत है। हमें पता है कि हमारी चेतावनी बहुत से लोगों को बुरी लगेगी लेकिन हमार ख्याल है कि यह कहना हमारा कर्तव्य है, नतीजा चाहे जो हो।