हमें यह नहीं मालूम कि वह क्या कारण हैं जिनकी वजह से ईरान के उप राष्ट्रपति इस्हाक़ जहांगीरी ने खुल कर यह एलान किया उनका देश, अलग तरीक़े से तेल बेच रहा है और अमरीका, कड़े प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक पहुंचाने में नाकाम रहा है, लेकिन हमें यह पता है कि इन प्रतिबंधों का कूल उद्देश्य, ईरानी जनता को भूखा रखना और ईरान की व्यवस्था को गिराने के लिए जनता को आंदोलन पर मजबूर करना है।
यह सही है कि ईरान का तेल निर्यात, पिछले अगस्त में बीस लाख बैरल प्रतिदिन से कम होकर 3 लाख 90 हज़ार बैरल प्रतिदिन हो गया था लेकिन चीन द्वारा ईरान से पुनः तेल की खरीदारी के बाद ईरान के तेल की बिक्री बढ़ गयी। ईरान पिछले 30 बरसों से अमरीका के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है इसी लिए उसके पास अपना तेल बेचने के कई तरीक़े हैं। ईरान अपने तेल की खरीदारी के लिए जिस प्रकार की सुविधाएं देता है वह चीन की रिफाइनेरियों जैसे तेल के खरीदारों के लिए बेहद आकर्षक होती हैं इसी लिए ईरान का तेल आराम से बिक रहा है।
ईरान ने युरोपीय सरकारों को " इन्सटेक्स " लेन-देन व्यवस्था बनाने पर मजबूर कर दिया और अब इस व्यवस्था में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम, डेनमार्क, हालैंड और फिनलैंड जैसे युरोपीय देश शामिल हैं जो ईरान और युरोप के मध्य लेन देन को सरल बनाएगी और इस से ईरान के खिलाफ अमरीकी प्रतिबंधों और घेराबंदी में एक बड़ा सा छेद होता महसूस हो रहा है।
अमरीकी प्रतिबंध चाहे जितने कड़े हों, तत्काल तो वह ईरान को नुक़सान पहुंचाते हैं लेकिन लंबी अवधि में इन प्रतिबंधों से ईरान अधिक मज़बूत होता है। ईरान में क्रांति की सफलता और इराक़ के साथ युद्ध आंरभ होने के बाद, ईरान को युद्धक विमान बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, अमरीकी बैंकों में ईरानी संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया गया और इन सब की वजह से ईरान को विकल्पों की खोज करना पड़ी और उसके परिणाम में ईरान कई काम किये जिनमें सब से बड़ा कारनामा, लंबी और छोटी दूरी के आधुनिक मिसाइलों और ड्रोन विमानों की तकनीक है जो दुनिया में बेहद आधुनिक ड्रोन विमानों में शामिल हैं इसी प्रकार ईरान ने आधुनिक पनडुब्बियां और युद्धपोत बनाने में भी सफलता प्राप्त की।
हमारे ख्याल में सऊदी अरब और यूएई जैसे अरब देशों की ओर से ईरान के साथ वार्ता का द्वार खोलने की कोशिश, सब से अच्छा मार्ग है क्योंकि पहली बात तो यह है कि अमरीकी मदद पर भरोसा नहीं किया जा सकता और दूसरी बात यह है कि ईरान से दुश्मनी का इन अरब देशों को सब से अधिक नुक़सान पहुंचेगा जैसा कि हमने देखा कि किस तरह से ईरान के घटकों ने यमन, इराक़ या लेबनान में सारे सैनिक समीकरण बदल दिये और यमन युद्ध के हालिया परिवर्तन हमारी बात की सच्चाई की गवाही देते हैं।
ईरान ने फार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों के लिए " हुरमुज़ शांति योजना" पेश की है, ओमान के विदेशमंत्री तेहरान की यात्रा पर हैं और शायद वह सऊदी अरब का कोई संदेश लेकर ईरान गये हैं जो वास्तव में दो हफ्ते पहले सऊदी अरब के उप रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान की मस्क़त की औचक यात्रा का परिणाम हो सकता है ताकि ट्रम्प की ओर से जारी ब्लैकमेलिंग रोकी जाए। (Q.A.) साभार, रायुलयौम, लंदन