30 नवंबर 2019 - 16:21
ईरान की सैन्य क्रांति के कारण अमरीका को चीन से नहीं बल्कि ईरान से डरने की ज़रूरत है, माइकल रुबिन

नेश्नल इंटरेस्ट वेबसाइट पर माइकल रुबिन ने ईरान की आने वाली सैन्य क्रांति के नाम से एक लेख लिखा है। वे इस लेख में अमरीका और पश्चिमी देशों को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अमरीका और दूसरे देश जब चीन के ख़िलाफ़ आर्टिफ़िशिय इंटेलिजेंस (कम्यूटर सिस्टम और तकनीक का विकास करके ऐसे कार्यों को अंजाम देना, जिसमें सामान्य रूप से मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है) के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की चर्चा कर रहे हैं, ईरान भी ज़्यादा दूर नहीं है।

ईरान रोबोटिक्स, ड्रोन्स और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में विकास के कठिन प्रयास कर रहा है।

हाल ही में ईरान द्वारा जहाज़ों को ट्रैक करने की क्षमता से इस क्षेत्र में ईरान की सैन्य चुनौती उजागर होती है।

एक ओर जहां फ़ार्स खाड़ी के अरब देश सैन्य बजट पर भारी ख़र्च करके अमरीकी हथियारों और सैन्य उपकरणों पर आश्रित हैं, वहीं ईरान दशकों के प्रतिबंधों और क्रांति के बाद इराक़ के साथ आठ वर्षीय युद्ध के बावजूद, रक्षा उद्योग में रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर है।

यहां इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से, मध्यपूर्व के कई देशों ने संदेह के साथ प्रौद्योगिकी और तकनीक को अपनाया। लेकिन ईरान इस क्षेत्र में एक अपवाद रहा है। मिसाल के तौर पर बीसवीं सदी की शुरुआत में, सऊदी वहाबी मौलवियों ने पहले टेलीग्राफ़ और फिर रेडियो की शुरुआत का विरोध किया।

1970 के दशक में, कुछ सऊदी मौलवियों ने शिकायत की थी कि मुस्लिम बच्चों को ईश्वर से दूर करने के लिए पश्चिम में टेलीविज़न की साज़िश रची गई थी। हालांकि बाद में कुछ वहाबी मौलवियों ने अपना कट्टरपंथी वहाबी दृष्टिकोण का प्रचार करने के लिए इस माध्यम का जमकर इस्तेमाल किया और आज भी कर रहे हैं।

ईरानी शाह नासिरुद्दीन (1848-1896) ने तेहरान में सैमुअल मोर्स द्वारा अमरीका की पहली लंबी दूरी की लाइन बिछाने के एक दशक बाद ही अपनी टेलीग्राफ़ लाइन बिछवा दी थी।

ईरानी शासन और जनता दोनों ने हमेशा से ही लगभग हर आधुनिक तकनीक को आसानी से अपनाया है।

इंटरनेट के बारे में भी यह सच्चाई उतनी ही सही है। कई अरब सरकारों ने शुरू में राजनीतिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों से इंटरनेट का मुक़ाबला करने या उसे दबाने की काफ़ी कोशिश की, लेकिन ईरान इस क्षेत्र में भी अन्य अरब देशों की विपरीत दिशा में आगे बढ़ा। 1993 में ईरान मध्यपूर्व का पहला ऐसा देश था, जिसने ख़ुद को इंटरनेट से जोड़ लिया था। 

वाशिंगटन ने हमेशा से ही ईरान को कम आंकने की ग़लती की है। ईरान का संपूर्ण परमाणु कार्यक्रम उन्नत तकनीक हासिल करने के लिए ईरान की क्षमता को दर्शाता।

आसान शब्दों में अगर कहें तो ईरानी इंजीनियर और वैज्ञानिक अत्याधुनिक सैन्य तकनीकों को विकसित करने में माहिर हैं। उदाहरण स्परूप, ईरान को अपना पहला उपग्रह कक्षा में लॉन्च किए हुए 10 साल बीत रहे हैं। इस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने कहा था, "विज्ञान के प्रति ईरानियों का दिव्य दृष्टिकोण।"

बेशक, उपग्रह प्रक्षेपण प्रौद्योगिकी आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को तेज़ी प्रदान करेगी। शायद इसीलिए पिछले साल ईरानी वैज्ञानिकों ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की श्रमता में वृद्धि के लिए एक जाइरोस्कोप (gyroscope) विकसित किया।

ईरानी सरकार ने नैनो तकनीक के  विकास और इस क्षेत्र में निवेश को भी प्रोत्साहित किया है। 31 जनवरी, 2015 को, ईरान की इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर ने एक नैनो टेक्नोलॉजी प्रदर्शनी का दौरा किया था और यह घोषणा की थी कि नैनोटेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  ईरान का सातवां स्थान है। इसी के साथ उन्होंने इस क्षेत्र में अधिक प्रगति का आहवान किया था। उन्होंने ईरानी युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि आपको आगे बढ़ना चाहिए और आपको इस क्षेत्र में प्रगति करने के विचार को नहीं छोड़ना चाहिए, इस क्षेत्र में दैनिक आधार पर विकास करना चाहिए।

ईरान ने 1985 में अन्य क्षेत्रीय देशों से एक या दो दशक पहले ही अपने पहले ड्रोन विमान का संचालन किया था। आज ईरानी सशस्त्र बलों के पास एक दर्जन से अधिक अलग-अलग मॉडलों के ड्रोन हैं, जिनमें सबसे आधुनिक दिन और रात में काम कर सकता है और एक साथ 12 घंटे से भी अधिक समय तक आसमान में उड़ान भर सकता है।

जबकि अमरीका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं, सैन्य प्रौद्योगिकी की अगली पीढ़ी में हाइपरसोनिक हथियार, रोबोटिक्स और स्वायत्त प्रणाली और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस शामिल हैं। ईरान अन्य क्षेत्रों की ही तरह इन क्षेत्रों में भी तकनीकों का विकास करने में सक्षम है।