जॉर्डन ने 1994 में एक समझौते के तहत अल-बाक़ूरा और अल-ग़ुमर इलाक़ों को इस्राईल के निंयत्रण में दे दिया था, जिन्हें इस्राईल वापस लौटाने में टाल मटोल से काम ले रहा था, लेकिन किंग अब्दुल्लाह द्वितीय ने इन इलाक़ों से ज़ायोनी शासन के निंयत्रण की समाप्ति का एलान करते हुए कहा है कि इन इलाक़ो की हर इंच ज़मीन पर उनके देश का अधिकार है और हम अपनी संप्रभुता की रक्षा करेंगे।
ग़ौरतलब है कि जॉर्डन सरकार इस्राईली दबाव में आकर इन इलाक़ों की लीज़ का समय बढ़ाना चाहती थी, लेकिन 2018 में जनता के भारी दबाव के चलते जॉर्डन किंग को इस्राईल को इन इलाक़ों से बाहर निकलने का नोटिस देना पड़ा था।
जॉर्डन उन अरब व मुस्लिम देशों में से एक है जिन्होंने इस्राईल के अवैध वजूद को औपचारिकता प्रदान कर रखी है और इस्राईल के साथ शांति समझौता कर रखा है, लेकिन एक स्वाधीन फ़िलिस्तीन देश के गठन को लेकर दोनों के संबंधों में तनाव रहता है, क्योंकि अम्मान फ़िलिस्तीन देश की स्थापना का भरपूर समर्थन करता है।
2017 में भी जॉर्डन और इस्राईल के बीच उस वक़्त तनाव चरम पर पहुंच गया था, जब अम्मान में इस्राईली दूतावास के एक सुरक्षा गार्ड ने दो नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था।
पिछले महीने बग़ैर किसी आरोप के जॉर्डन के दो नागरिकों को गिरफ़्तार करके जेल भेजने पर आपत्ति जताते हुए अम्मान ने अपने राजदूत को अस्थायी रूप से तेल-अवीव से वापस बुला लिया था।
इस्राईल ने अल-बाक़ूरा पर 1948 में और अल-ग़ुमर पर 1967 की लड़ाई के दौरान क़ब्ज़ा कर लिया था, जिनका वह कृषि और पर्यटन के लिए इस्तेमाल कर रहा था।
1994 में जॉर्डन और इस्राईल के बीच कथित शांति समझौते के कारण, इस क़ब्ज़े को लीज़ में बदल दिया गया और इसके लिए 25 वर्ष की समय सीमा रखी गई।