तसनीम न्यूज़ एजेंसी की ख़बर के मुताबिक़, इराक़ी पुलिस ने मंगलवार को सैफ़ साद इलाक़े से उस समय सर्ख़ी को गिरफ़्तार किया, जब वह भेस बदलकर भागने की कोशिश कर रहे थे।
इराक़ के ख़ुफ़िया सूत्रों के मुताबिक़, विवादित धर्मगुरु अल-सर्ख़ी के अनुयाई हिंसा का सहारा लेकर कर्बला के पुराने इलाक़े में घुसना चा रहे थे, जिसे इराक़ी सुरक्षा बलों ने नाकाम बना दिया।
इराक़ी सुरक्षा बलों ने सैफ़ साद इलाक़े में स्थित सर्ख़ी के कार्यालय को चारो ओर से घेर लिया और हिंसा फैलाने वाले तत्वों को जब आत्मसमर्पण करने के लिए कहा तो उन्होंने पुलिसकर्मियों पर रॉकेटों और बमों से हमला कर दिया।
सूत्रों का कहना है कि कर्बला में सर्ख़ी के अनुयाईयों और इराक़ी सुरक्षा बलों के बीच भीषण झड़पें हुईं हैं।
अल-सर्ख़ी कौन हैं?
महमूद बिन अब्दुल-रज़ा बिन मोहम्मद अल-सर्ख़ी एक विवादित शिया धर्मगुरु हैं, उनका दावा है कि वह शिया मुसलमानों के वरिष्ठ धर्मगुरु हैं, जिस तरह से इराक़ में आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी शिया मुसलमानों के वरिष्ठ धर्मगुरु हैं।
2003 से पहले सर्ख़ी को कोई नहीं जानता था, लेकिन इराक़ पर अमरीका के हमले के नतीजे में सद्दाम के पतन के बाद अचानक वह अपने कुछ कट्टर अनुयाईयों के साथ कर्बला में प्रकट हुए और आयतुल्लाह होने के दावे के साथ लोगों से कहा कि वे उनका अनुसरण करें।
हालांकि इराक़ और विदेशों में किसी भी आयतुल्लाह या शिया वरिष्ठ धर्मगुरु ने अल-सर्ख़ी के आयतुल्लाह या मुजतहिद होने की पुष्टि नहीं की है।
अल-अरबिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में इराक़ में तकफ़ीरी आतंकवादी गुट दाइश के उभरने के साथ ही पवित्र शहर कर्बला में सर्ख़ी ने अपने अनुयाईयों के साथ सशस्त्र विद्रोह का एलान कर दिया था।
सर्ख़ी पारम्परिक शिया इस्लाम के मुख़ालिफ़ हैं और उनका दावा है कि शिया मुसलमानों के बारहवें इमाम से जो जीवित हैं लेकिन लोगों की नज़रों से ओझल हैं, उनका सीधा संपर्क है।
उनका यह दावा है कि वह शिया मुसलमानों के दूसरे इमाम के वंशज हैं।
सर्ख़ी का जन्म 1964 में बग़दाद के उपनगरीय इलाक़े काज़मैन में हुआ था। उन्होंने बग़दाद के इंजीनियरंग कॉलेज से इंजीनियरंग की डिग्री हासिल की। सद्दाम के साशनकाल तक सर्ख़ी का कहीं अतापता नहीं था, लेकिन सद्दाम के पतन के बाद उन्होंने राजनीतिक गतिविधियां और बयानबाज़ी शुरू कर दी।
सर्ख़ी का यह भी दावा है कि इराक़ पर अमरीका के हमले के बाद उन्होंने अमरीकी सैनिकों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध किया और 3 अमरीकी सौनिकों को मौत के घाट उतार दिया था।
इस दावे के बाद ही सर्ख़ ने शिया मुसलमानों के बारहवें इमाम से मुलाक़ात का दावा किया, जिसे इराक़ के वरिष्ठ शिया धर्मगुरुओं ने ख़ारिज कर दिया।
फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, जब सर्ख़ी का कच्चा चिट्ठा खंगाला गया तो उनकी हक़ीक़त खुलकर सामने आई कि वह सद्दाम की बास पार्टी की ख़ुफ़िया सेल के सदस्य हैं और शियों में मरजियत या वरिष्ठ धर्मगुरुओं के धार्मिक अनुसरण के सिस्टम को कमज़ोर करने के मिशन पर सऊदी ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक़, सर्ख़ी ने अपने कई नाम बदले हैं, पहले उनका नाम महमूद अब्दुर्रज़ा अल-बहादेली था, उसके बाद उन्होंने अपना नाम शेख़ महमूद अल-तमीमी रख लिया और उसके बाद सैय्यद महमूद अल-सर्ख़ी नाम रखकर सफ़ेद अमामे के बजाए सिर पर काला अमामा रख लिया।
1990 के दशक में सद्दाम की पुलिस ने घर में सेटेलाइट टीवी लगाने के आरोप में सर्ख़ी को गिरफ़्तार किया था, जेल में बंद रहने के दौरान इराक़ी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने उनकी नकारात्मक योग्यताओं को पहचानकर उन्हें ट्रेनिंग दी और जादू टोना सीखने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप भेज दिया।
एक साल तक जादू टोने की ट्रेनिंग लेने के बाद जब वे इराक़ वापस लौटे तो उन्होंने बारहवें इमाम से मुलाक़ात करने का दावा कर दिया।
सर्ख़ी ने इराक़ के वरिष्ठ शिया मुस्लिम धर्मगुरुओं का विरोध करना शुरू कर दिया और बाहरवें इमाम के नाम पर एक गुट का गठन किया, जिसका काम विरोधियों को रास्ते से हटाना था।
2014 में आयतुल्लाह सीस्तानी ने जब दाइश के ख़िलाफ़ जिहाद का फ़तवा दिया तो सर्ख़ी ने इसका कड़ा विरोध किया और ख़ुद दाइश के ख़िलाफ़ हथियार उठाने को हराम क़रार दे दिया।
मिस्र के अल-वतन अख़बार को इंटरव्यू देते हुए सर्ख़ी ने कहा थाः दाइश एक सच्चाई है, जिसे इतने जल्दी ख़त्म नहीं किया जा सकता। इसलिए उससे ख़त्म करने पर टाइम बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए और ख़ून ख़राबा करने से बचना चाहिए।
उन्होंने यमन पर सऊदी अरब के हमले का समर्थन करते हुए सऊदी सैन्य गठबंधन को इस्लामी गठबंधन क़रार दिया था और कहा था कि हम यमन के ख़िलाफ़ उसकी सैन्य कार्यवाही का स्वागत करते हैं।
सऊदी अरब द्वारा वरिष्ठ शिया धर्मगुरू शेख़ निम्र बाक़िर अल-निम्र को फांसी दिए जाने का समर्थन करते हुए सर्ख़ी ने कहा था कि इराक़ी और ईरानी अधिकारियों को सऊदी अरब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।
सर्ख़ी की गतिविधियों पर एक नज़र डालने से आसानी से यह बात समझ में आ जाती है कि वह कौन हैं और किसके लिए काम कर रहे हैं।