इस झड़प में तीन लोगों की मौत हो गई और 12 घायल हो गए।
इस हमले के बाद इराक़ी प्रदर्शकारियों ने अपना हिसाब विदेशी शक्तियों के इशारे पर हिंसा फैलाने वाले तत्वों से अलग कर लिया है और लोगों ने बग़दाद सरकार और धार्मिक नेतृत्व के पक्ष में प्रदर्शन किया है।
इराक़ी विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी करके इस हमले की निंदा की है और चेतावनी दी है कि देश में स्थित विदेशी दूतावासों और कांसूलेटों की सुरक्षा लक्षमण रेखा है और इसे लांघने की किसी को अनुमति नहीं दी जाएगी।
प्रदर्शनों का सहारा लेकर हिंसा फैलाने और सुरक्षा बलों पर हमला करने तथा निजी व सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने से इराक़ की आम जनता रोष में है और उसका कहना है कि जब तक देश से राष्ट्र के दुश्मन अमरीका को पूर्ण रूप से बाहर नहीं किया जाता है, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी।
कर्बला में रहने वाले 35 वर्षीय हसन अली का कहना है कि अमरीका पिछले 3 दशकों से इराक़ में हिंसा और अराजकता फैला रहा है और यह सब तेल का खेल है। उन्होंने कहा, 1990 में अमरीका ने सद्दाम को उकसाकर कुवैत पर हमला करवा दिया, जिसके बाद कुवैत को सद्दाम से बचाने के लिए इराक़ पर हमला कर दिया। उसके बाद 2003 में सामूहिक हथियारों के बहाने इराक़ पर सैन्य चढ़ाई कर दी। इराक़ी जनता के कड़े प्रतिरोध के कारण जब 2011 में जब अमरीका अपने सैनिकों को यहां से निकालने पर मजबूर हो गया तो दाइश जैसे आतंकवादी गुटों का गठन किया और फिर उससे लड़ने के बहाने उसने अपने सैनिक देश में तैनात कर दिए।
अली का कहना था कि अमरीका मध्यपूर्व के आर्थिक स्रोतों और ऊर्जा स्रोतों पर लालची नज़रें गढ़ाए हुए है और वह अपने इस उद्देश्य तक पहुंचने के लिए पड़ोसी देशों को हमेशा आपस में लड़ाने और इन देशों की जनता के बीच साम्प्रदायिक फूट डालने की साज़िश रचता रहता है।
बसरा के रहने वाले नागरिक मोहम्मद क़ासिम का कहना था कि अमरीका को अब हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना बंद करना चाहिए और हमारे वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्लाह सैय्यद अली सीस्तानी ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में साम्राज्यवादी शक्तियों को यह संदेश दे दिया है कि वह इराक़ से निकल जायें। msm