3 नवंबर 2019 - 12:23
ईरान की ओर से परमाणु समझौते के वादों में कमी के चौथे चरण से पहले जर्मनी और भारत का अहम बयान, परमाणु समझौते के भरपूर समर्थन का ऐल

जर्मनी की चांसलर एंगला मर्केल ने अपनी भारत यात्रा में इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया है जिसमें परमाणु समझौते के समर्थन की घोषणा की गई है।

परमाणु समझौते से संबंधित मामलों के बारे में हफ़्तों से जारी ख़ामोशी के बाद इस संबंध में लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ है। इस बार जर्मनी और भारत ने एक संयुक्त बयान जारी किया। शुक्रवार को जारी होने वाले दोनों देशों के बयान में ईरान व गुट पांच धन एक के बीच हुए परमाणु समझौते या जेसीपीओए के बारे में भी संकेत किया गया है। नई दिल्ली और बर्लिन के नेताओं ने अपने बयान में बल देकर कहा है कि भारत और जर्मनी, ईरान व छः अन्य देशों के बीच हुए परमाणु समझौते को पूरी तरह से लागू किए जाने पर बल देते हैं। बयान में परमाणु समझौते से संबंधित मामलों को शांतिपूर्ण ढंग से और राजनैतिक वार्ता के माध्यम से हल करने पर बल दिया गया है और कहा गया है कि भारत और जर्मनी का मानना है कि परमाणु समझौते का संपूर्ण पालन, क्षेत्र व संसार की शांति व सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।

 

एंगला मर्केल की भारत यात्रा, जो बरसों से ईरान के सबसे अहम तेल ख़रीदारों और व्यापारिक भागीदारों में से एक है, ऐसे समय में हुई है जब तेहरान, परमाणु समझौते के संबंध में अपने वादों को कम करने का चौथा क़दम उठाने वाला है। टीकाकारों का कहना है कि अपनी कटिबद्धताओं को कम करने के मार्ग पर चलने में ईरान की गंभीरता के चलते ही यूरोपीय पक्ष में खलबली मच गई है और अगर उसने अपने प्रस्तावित क़दमों को व्यवहारिक नहीं बनाया तो फिर अगले कुछ दिनों में हम देखेंगे कि ईरान परमाणु समझौते के अंतर्गत अपने वादों को कम करने का चौथा क़दम भी उठा लेगा। इस बीच एक अहम बिंदु यह है कि मर्केल के साथ ही अमरीका के वित्त मंत्री स्टीवन मनुचेन भी भारत पहुंचे हुए थे। वाइट हाउस के अधिकारी, परमाणु समझौते से वाॅशिंग्टन के निकलने के बाद अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हर अवसर से फ़ायदा उठाने की कोशिश करते हैं। मनुचेन ने ट्रम्प के दामाद और उनके वरिष्ठ सलाहकार जेरड कूश्न के साथ कुछ दिन पहले मध्यपूर्व का दौरा शुरू किया था, मर्केल के साथ ही शुक्रवार को भारत पहुंचे।

 

यह समझना कठिन नहीं है कि जर्मनी की चांसलर के भारत के दौरे के अवसर पर ही अमरीका के वित्तमंत्री, जो ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंधों के मुख्य रणनीतिकारों में से एक हैं, क्यों नई दिल्ली पहुंचे हैं? ईरान के तेल के बड़े ख़रीदारों में से एक के रूप में भारत, अमरीका के प्रतिबंधों को विफल बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि जबसे अमरीका, परमाणु समझौते से निकला है, तभी से वह भारत और कुछ अन्य देशों पर निरंतर दबाव डाल रहा है। निश्चित रूप से ईरान की वित्तमंत्री और रिज़र्व बैंक के प्रमुख से मनुचेन की वार्ता का एक अहम विषय ईरान रहा होगा। अलबत्ता मर्केल की भारत यात्रा और परमाणु समझौते पर उनकी बात-चीत एक नया विषय है क्योंकि हालिया बरसों में यह ज़िम्मेदारी फ़्रान्स के राष्ट्रपति एमानोएल मैक्रां के कंधों पर थी। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मैक्रां की निरंतर टेलीफ़ोनी वार्ता और संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के अवसर पर उनकी कई मुलाक़ातों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

 

कुल मिला कर इस बात की आशा रखी जा सकती है कि तेहरान की ओर से परमाणु समझौते के संबंध में अपने वादों को कम करने का चौथा क़दम उठाए जाने के अवसर पर इस समझौते के अन्य पक्ष ठोस क़दम उठाएंगे क्योंकि जैसे जैसे ईरान अपने वादों को कम करने के क़दम उठाता जाएगा, वैसे वैसे इस समझौते को बचाने की आशाएं धूमिल होती जाएंगी।