30 अक्टूबर 2019 - 13:51
हरीरी ने इस्तीफ़ा प्रदर्शनों के कारण दिया या बाहरी दबाव में? क्या वह राजनैतिक शून्य शुरू हो गया जिसकी चेतावनी सैयद नसरुल्लाह ने

अरब जगत के जाने माने टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः लेबनान के प्रधानमंत्री सअद अलहरीरी के त्यागपत्र पर लेबनान की सड़कों के साथ ही अरब दुनिया में भी खुशी मनाई गई साथ ही इसे ज़िम्मेदारियों से भागने वाला क़दम भी कहा गया जिससे कोई हल नहीं निकलेगा बल्कि संकट और बढ़ेगा।

कुछ लोगों ने इसे साहसिक क़दम बताया जिसे उठाया जाना ही था ताकि देश को गृह युद्ध और संप्रदायिक टकराव से बचाया जाए।

सअद हरीरी शुरू में तो त्यागपत्र देने से इंकार कर रहे थे मगर मंगलवार को उन्होंने सक्षिप्त भाषण में कहा कि उनकी कोशिशें नाकाम हो गई हैं और उनका त्यागपत्र ज़रूरी हो गया है मगर राष्ट्रपति मिशल औन ने जिनको इस त्यागपत्र से झटका लगा है, सअद हरीरी से सोच विचार करने की मांग की। उन्होंने त्यागपत्र स्वीकार या रद्द करने के बारे में कोई बात नहीं कही। शायद वह कुछ समय चाहते जिसमें वह हिज़्बुल्लाह और अमल सहित लेबनानी राजनैतिक ताक़तों से विचार विमर्श करना चाहेंगे।

हिज़्बुल्लाह के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने अपने हालिया भाषण में जिस राजनैतिक शून्य की ओर से चेतावनी दी थी जो गृह युद्ध की ओर देश को ले जा सकता है वह अब शुरू हो चुका है। सड़कों और चौराहों पर प्रदर्शनकारियों पर अज्ञात लोगों की तरफ़ से हमले हुए हैं। इसका आरोप हिज़्बुल्लाह और अमल पर लगाया गया लेकिन दोनों ही पार्टियों ने इसका खंडन किया है।

इस त्यागपत्र के बाद लेबनान विस्फोटक स्थिति में पहुंच गया है। ख़ास तौर पर इसलिए कि अनेक आंतरिक, बाहरी, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ताक़तें हैं जो लेबनान को शांति और सुरक्षा की स्थिति में नहीं देखना चाहतीं बल्कि हिज़्बुल्लाह को निशाना बनाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़तीं। क्योंकि हिज़्बुल्लाह अब अरब दुनिया के मुख्य मामलों में प्रभावी और निर्णायक ताक़त बन गया है और इस्राईली क़ब्ज़े और अमरीकी एजेंडे के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।

हमें नहीं पता कि सअद हरीरी ने त्यागपत्र अपनी मर्ज़ी से दिया है या विदेशी ताक़तों विशेष रूप से अमरीका तथा फ़ार्स खाड़ी में उसके घटक देशों के दबाव में यह क़दम उठाया है। मगर हम यह जानते हैं कि इससे पहले कई अवसरों पर उन्होंने इस दबाव के सामने प्रतिरोध किया था और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने से इंकार कर दिया था। हालांकि उन्हें इन ताक़तों विशेष रूप से सऊदी अरब की ओर से धमकियां मिल रही थीं और कहा जा रहा था कि उनका विकल्प तलाश कर लिया जाएगा। विकल्प के रूप में पहला नाम उनके भाई बहा हरीरी का था जबकि अशरफ़ रीफ़ी और फ़ुआद सिन्यूरा भी लाइन में थे और यह सब इस समय प्रधानमंत्री पद के लिए बहुत लालायित दिखाई दे रहे हैं।

हमें यह नहीं लगता कि प्रदर्शनकारी जिन्हें पहली सफलता मिल गई है, इसी पर ख़ामोश होकर घर लौट जाएंगे क्योंकि उनके पास मांगों की लंबी सूची है। सबसे पहली मांग तो संप्रदायिक आधारों पर स्थापित राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ना है। इसके अलावा क़ानूनों में बदलाव, चुनाव के क़ानून में बदलाव, भ्रष्टाचार के रास्तों को बंद करना, बहुत सी मांगें हैं।

इस समय तीन परिस्थितियां सामने आ सकती हैं,

एक तो यह कि सअद हरीरी को ही सरकार बनाने का पुनः मौक़ा दिया जाए और उन मंत्रियों को निकाल दिया जाए जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं जिनमें राष्ट्रपति औन के दामाद और विदेश मंत्री जिबरान बासिल और वित्त मंत्री हसन ख़लील के नाम प्रमुख हैं।

दूसरे यह कि टेक्नोक्रेट्स की सरकार बने जिसका उद्देश्य देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालना हो।

तीसरे यह कि संसद में प्रभावशाली ताक़तों यानी हिज़्बुल्लाह, अमल तथा मिशल औन की पार्टी की मज़बूत संयुक्त सरकार बने। कुछ लोग इसी तीसरे विकल्प का इशारा भी दे रहें हें और इसे अंतिम समाधान के रूप में देखते हैं।

लेबनान के प्रदर्शन बहुत कामयाब रहे हैं और प्रदर्शनों में अलग अलग समुदायों और संप्रदायों की एकजुटता और समरसता प्रशंसनीय रही है। इन प्रदर्शनों ने उन्हीं मुद्दों पर ख़ुद को केन्द्रित किया है जो लेबनान की समस्याओं की मुख्य जड़ हैं।

सवाल यह है कि यह बुनियादी बदलाव कैसे आए और इस तरह आए कि हिज़्बुल्लाह की सामरिक ताक़त को सीमित करने की कोशिश न की जाए क्योंकि वह इस्राईल के मुक़ाबले के लिए बेहद ज़रूरी है? यह इस समय लेबनान के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। बाहरी ताक़तें यही नहीं होने देना चाहतीं। वह हिज़्बुल्लाह को समाप्त करने में नाकाम रही हैं तो अब लेबनान को गृह युद्ध की खाई में ढकेल कर यह लक्ष्य हासिल करना चाहती हैं। जबकि इससे लेबनान की सभी ताक़तें बचना चाहेंगी क्योंकि इससे सबको नुक़सान पहुंचेगा और लेबनान एक अलग ही स्थिति में पहुंच जाएगा।

बाहरी ताक़तों के कुछ एजेंट लेबनान के भीतर हैं जो उत्तेजक क़दम उठा रहे हैं ताकि चालाकी से फ़साद करवा दें। यह ताक़तें अभी तो प्रदर्शनकारियों के बीच खाने बांट रही हैं लेकिन बाद में हथियार बांटेंगी। इसलिए सावधानी बहुत ज़रूरी है।