23 अक्टूबर 2019 - 12:33
नेतनयाहू शायद उसी जेल में जाएं जहां ओलमर्ट गए थे, इस्राईल से दोस्ती की पेंग बढ़ाने वाले अरब नेता भी अपनी ख़ैर मनाएं क्योंकि उनके

यह बात माननी पड़ेगी कि इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू जो नई सरकार के गठन में नाकाम हो गए हैं उन्होंने 23 साल से अधिक समय तक प्रधानमंत्री पद संभलाने के दौरान अरब सरकारों से बड़े अच्छे रिश्ते बना लिए, ईरान के ख़तरे का बार बार उल्लेख करके अरब सरकारों के साथ सामरिक गठबंधन बनाने का रास्ता भी साफ़ किया मगर यह भी सच्चाई है कि नेतनयाहू अपने सारे युद्ध हार गए।

उन्होंने सीरिया पर लगातार हमले किए लेकिन वहां से ईरानी फ़ोर्सेज़ को बाहर नहीं निकाल सके और न ही हिज़्बुल्लाह के मिसाइलों के भंडारों को ध्वस्त कर सके और न ही ग़ज़्ज़ा पट्टी की एक इंच ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर सके।

कुछ लोग यह कह सकते हैं कि नेतनयाहू जो भ्रष्टाचार के मामले में बहुत जल्द जेल की सलाखों के पीछे नज़र आने वाले हैं इस्राईल के लिए कुछ बड़े उपहार हासिल करने में भी सफल हुए हैं। एक उपहार अमरीका का बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की राजधानी घोषित करके अपना दूतावास वहां स्थानान्तरित करना है, दूसरा उपहार गोलान हाइट्स को इस्राईली का हिस्सा घोषित किया जाना है। यह बात सही तो है लेकिन यह भी सच है कि यह सारे उपहार इस्राईल के लिए बड़े ज़हरीले उपहार हैं और कभी भी उसके हाथ से फिसल सकते हैं। विशेष रूप से उप स्थिति में जब यह उपहार देने वाले नेता अर्थात ट्रम्प भी उसी अंजाम को पहुंच जाएं जो नेतनयाहू का हुआ यानी  राष्ट्रपति पद से बर्खास्त कर दिए जाएं या चुनाव हार जाएं।

नेतनयाहू कोई युद्ध नहीं जीते लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनको यह कामयाबी ज़रूर मिली कि उन्होंने अमरीका और यूरोप में ज़ायोनी लाबियों की मदद से हमास और हिज़्बुल्लाह को आतंकी संगठन घोषित करवाया। मगर यह कामयाबी भी उन्हें इसलिए मिली कि अरब जगत बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा है, यहां सारे फ़ैसलों का आधार और मूल सूत्र पैसा हो गया है। जबकि अरब जगत के स्तंभ समझे जाने वाले राष्ट्र यानी सीरिया, इराक़, मिस्र, अलजीरिया और मोरक्को कठिनाइयों में फंसे हुए हैं।

अरब नेताओं से नेतनयाहू की दोस्ती और फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के उनके दौरे और उनके मंत्रियों के दौरे फ़िलिस्तीन मुद्दे को नुक़सान पहुंचा रहे हैं। इन अरब सरकारों ने इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चे के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है।

जनरल बेनी गान्ट्स जो अपने दावे के अनुसार नई लिबरल सरकार के गठन की कोशिश शुरू करने जा रहे हैं उनके हाथ और उनकी ब्लू वाइट पार्टी में शामिल अन्य जनरलों के हाथ अरब जनता के खूंन से रंगीन हैं। अरबों और मुसलमानों से नफ़रत करने में वह भी पीछे नहीं हैं।

हमें यह देखकर अच्छा लगा कि नेतनयाहू का राजनैतिक कैरियर समाप्त हो रहा है और उसी तरह समाप्त हो रहा है जिस तरह वर्ष 2006 के लेबनान युद्ध के चैंपियन कहलाने का सपना देखने वाले एहूद ओलमर्ट का हुआ था। शायद नेतनयाहू भी उसी जेल में रखे जाएं जिसमें ओलमर्ट रहा करते थे। बस अंतर यह होगा कि वहां वह शैम्पेन और सिगरेट उन्हें नहीं मिलेगी जिसकी उनको प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए आदत पड़ गई थी।

अब वह ज़माना आ गया है कि जनता ने ट्यूनीशिया में पाक साफ़ इंसान क़ैस सईद को चुनाव जिताकर राष्ट्रपति बना दिया है और मिलियनों की संख्या में समर्थक उनके साथ खड़े हैं क्योंकि उन्होंने साफ़ साफ़ कहा था कि फ़िलिस्तीन की धरती पर क़ब्ज़ा करने वाले इस्राईल से संबंध रखना ग़द्दारी है, उनके समर्थकों ने फ़िलिस्तीन का झंडा भी उठाया। दूसरी ओर लेबनान में जनता भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सड़कों पर है और भ्रष्ट व्यवस्था को हटाने पर तुल गई है, वहां भी लोग फ़िलिस्तीन का ध्वज उठा रहे हैं। तो इसका मतलब साफ़ है कि नेतनयाहू से रिश्तों की पेंग बढ़ाने वाले अरब नेता शर्म से अपना सिर झुका लें और अपनी ख़ैर मनाएं क्योंकि अब उनके सितारे गरदिश में हैं।