7 अक्टूबर 2019 - 13:53
क्या बिन सलमान ने टेक दिये घुटने? ईरान की बढ़ती ताक़त और मध्य पूर्व में बदलते समीकरण ... अतवान का धमाकेदार लेख ...

सऊदी अरब के उप रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान और अंसारुल्लाह की राजनीतिक परिषद के प्रमुख सैयद मेहदी मश्शात के बीच निंरतर संपर्क की खबरों के सही या गलत होने पर ध्यान न भी दें तब भी यह साफ है कि सऊदी अरब, यमन में युद्ध जारी रखने की ताक़त नहीं रखता इस लिए यमन की ज़मीन पर पैर जमाए हमलों का डट कर मुक़ाबला करने वाले दुश्मन से बात चीत ही, सऊदी अरब को इस खर्चीले दलदल से निकालने का एकमात्र रास्ता है।

        खालिद बिन सलमान ने जो ट्वीट किया है उसमें उन्होंने कहा है कि युद्धबंदी का जो सुझाव, सैयद मश्शात ने पेश किया है उसे हम सकारात्मक समझ रहे हैं। इस प्रकार के संकेतों से यह साबित होता है कि सऊदी अरब एक तरफ यमन के अंसारुल्लाह और दूसरी तरफ ईरान से बात चीत का मन बना चुका है क्योंकि उसकी समझ में यह बात आ चुकी है कि न अमरीका और न ही इस्राईल उसकी सुरक्षा को सुनिश्चित बना सकते हैं  और इसी प्रकार वह इस युद्ध में उसे जीत भी नहीं दिला सकता।

     सऊदी अरब की परेशानी की वजह सिर्फ यमन युद्ध में जीत या हार नहीं है बल्कि उसे तो अब सबसे अधिक चिंता, आले सऊद के शासन की हो गयी है। रोयटर्ज़ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में आले सऊद में इसी चिंता के बारे में विस्तार से बताया है और इसी वजह से सऊदी अरब के शासक घराने में बिन सलमान को लेकर गुस्सा भी पाया जाता है क्योंकि खान्दान के सदस्यों को यह महसूस हो रहा है कि क्राउन प्रिंस बिन सलमान, यमन ही नहीं बल्कि अमरीका के उकसावे में आकर ईरान के खिलाफ भी अपनी नीतियों में गलती कर रहे हैं।

 यमन के हौसियों को सऊदी अरब की इस चिंता की बहुत पहले से खबर लग गयी थी इसी लिए उन्होंने ईरान व लेबनान में अपने घटकों या फिर रियाज़ के निकट किसी पश्चिमी पक्ष के सुझाव का पालन करते हुए यमन संकट के पेड़ की ऊंची डाल  पर लटक रहे  क्राउन प्रिंस बिन सलमान को उतरने के लिए सीढ़ी दे दी है।  

     असांरुल्लाह से सऊदी अरब की सीधी बात चीत का सीधा मतलब, मंसूर हादी की " सरकार" का अंत हो जाएगा और यमन बल्कि इलाक़े के समीकरण से भी वह निकल जाएगी। इसके साथ ही पांच वर्षों तक डट कर मुक़ाबला करने के बाद हौसियों की कानूनी हैसियत स्वीकार कर ली जाएगी।

     आम तौर पर सैनिक टकराव में जब उस वक्त युद्ध बंदी और शांति की बात की जाती है जब दोनों पक्षों को यह विश्वास हो जाता है कि युद्ध जारी रखना और नुक़सान को सहन करना संभव नहीं है लेकिन यमन के मामले में हालात अलग हैं। जिस पक्ष को सब से अधिक नुक़सान हुआ है और जो, युद्ध बंदी में सब से अधिक रूचि रखता है वह आक्रमण करने वाला और युद्ध शुरु करने वाला पक्ष है अर्थात सऊदी अरब और यूएई का गठबंधन। जबकि उनके हमलों का सामना करने वाला पक्ष अर्थात अंसारुल्लाह अधिक मज़बूत हो गया है और युद्ध के पांचवे बरस में वह अपने दुश्मन को चौंकाने की अधिक क्षमता रखता है जिसका एक प्रदर्शन आरामको पर हमले और नजरान में सऊदी अरब से 3000 तक बंदी बनाने के बाद हुआ।

 

     हम एक बार फिर कह रहे हैं, समीकरण बदल चुके हैं, यमन के युद्ध में ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में भी और उसकी वजह भी यह है कि प्रतिरोध मोर्चा, ईरान पर अमरीका के कड़े से कड़े प्रतिबंधों के बावजूद मज़बूत हो रहा है और अमरीका ईरान को झुकाने में नाकाम हो चुका है।

     मिस्र, अपनी वुजूद की लड़ाई लड़ रहा है, इस्राईली चुनाव में नेतेन्याहू बड़ी जीत दर्ज कराने में विफल हो चुके हैं, डोनाल्ड के गले में महभियोग का फंदा कसता जा रहा है, ईरान की सैनिक ताक़त बढ़ती जा रही है और चीन से आरंभ होकर दक्षिणी बैरुत और मूमध्य सागर तक फैली सैन्य सिल्क रोड फिर से खुल गया है तो इन हालात में सऊदी अरब को सबक़ लेना चाहिए।

     हमें आशा है कि सऊदी गठबंधन यहूदी नव वर्ष पर शुभ कामना देने का सिलसिला रोक देगा और इस्राईल के गठन की सालगिरह पर उसके बधाई देने के बारे में भी नहीं सोचेगा  तो क्या कोई हमारी आवाज़ सुन रहा है? नहीं सुनेगा तो फिर हालात भविष्य बहुत ज़्यादा खराब होंगे।