27 सितंबर 2019 - 14:38
ईरानी कूटनीति ने दुनिया में बिठा दी अपनी धाक, विलुप्त हो गए अरब नेता, होप एलायंस बनाने के तेहरान के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार

अरब जगत के विख्यात टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः अगर सारे नहीं तो अधिकतर राजनैतिक परिवर्तन बिल्कुल उसी तरह हो रहे हैं जो ईरान चाहता है।

राष्ट्रपति रूहानी संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के हालिया अधिवेशन के स्टार बने रहे जबकि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प जो तेहरान से दुशमनी पर तुले रहते हैं और आए दिन नए प्रतिबंधों का एलान करते हैं अब चुनावी भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं जांच में उन्हें पद भी गंवाना पड़ सकता है। जबकि दूसरी तरफ देखिए तो चीन ने ईरान में 450 अरब डालर के निवेश का एलान किया है।

विश्व पटल पर और संयुक्त राष्ट्र संघ के गलियारों में ईरानी कूटनीति ने अपन झंडे गाड़ दिए। अधिकतर पश्चिमी नेता राष्ट्रपति रूहानी से मिलने के लिए लाइन में खड़े दिखाई दिए। फ़्रांसीसी राष्ट्रपति मैकक्रां ने तो राष्ट्रपति रूहानी और डोनल्ड ट्रम्प की मुलाक़ात करवाने के लिए अपनी जान लगा दी। ट्रम्प इस मुलाक़ात के लिए बेचैन थे और नए नए मध्यस्थों को बार बार डाक्टर रूहानी के पास भेज रहे थे। ट्रम्प को कामयाबी नहीं मिली। ईरानी नेता कभी भी यूरोप के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। उन्हें पश्चिमी नेताओं से हाथ मिलाने और फ़ोटो खिंचवाने का कोई शौक़ नहीं है। राष्ट्रपति रूहानी ने बिल्कुल सही कहा कि फ़ोटो सेशन वार्ता के आख़िर में और सहमति बन जाने के बाद होता है पहले नहीं।

ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने फिर साबित कर दिया कि कूटनीति के सारे हथकंडों की हक़ीक़त उन्हें अच्छी तरह मालूम हैं और उन्हें बहुत अच्छी तरह पता है कि कूटनीति की बिसात पर कब कौन सी चाल चलनी है। सुप्रीम लीडर ने जब दो टूक शब्दों में कह दिया कि अमरीका और इस्राईल के अलावा ईरान दुनिया के किसी भी देश से वार्ता कर सकता है, साथ ही उन्होंने यूरोपीयों पर बहुत तेज़ प्रहार करते हुए कहा कि वह अमरीका से अलग नहीं हैं, वह अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का पालन करते हैं, यूरोपीय देश अमरीका के ख़िलाफ़ कोई भी क़दम उठाने को तैयार नहीं हैं, तो सुप्रीम लीडर के इस बयान का मतलब यह है कि वार्ता की मेज़ पर ट्रम्प और रूहानी की मुलाक़ात में अभी बहुत समय लगेगा बल्कि शायद यह मुलाक़ात हो ही न सके क्योंकि कई तरफ़ से घेरा तंग कर रहे है संकटों को देखते हुए लगता है कि सत्ता में ट्रम्प के दिन अब ज़्यादा नहीं बचे हैं।

अनुभवों से साबित हो गया है कि ईरानियों के पास बड़ी मज़बूत इच्छा शक्ति और संयम की ताक़त है, वह पश्चिमी देशों से प्रभावित नहीं होते और अपनी हर शर्त मनवाने की ताक़त रखते हें।

हम सुप्रीम लीडर की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि यूरोपीय देश अमरीका के पिछलग्गू हैं, अमरीका की कोई भी बात टालना यूरोप के बस की बात नहीं है। इसलिए कि यूरोपीय देशों ने अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ सीरिया और लीबिया सहित हर युद्ध में अमरीका का साथ दिया और अब भी दे रहे हैं। अतः यह मान लेना कि वह अमरीका से अलग कोई ताक़त हैं जिसे अलग विकल्प माना जा सकता है, सही नहीं होगा।

दो युद्ध वह थे जिनमें यूरोपीयों और विशेष रूप से ब्रिटेन और फ़्रांस ने अमरीका की सहमति के बग़ैर क़दम रखा। एक तो दूसरा विश्व युद्ध था और अगर इस युद्ध में अमरीका न कूदा होता तो यूरोप यह युद्ध हार जाता। दूसरे स्विस युद्ध है जिसमें ब्रिटेन, फ़्रांस और इस्राईल ने वर्ष 1956 में हमला किया था। अमरीका के विरोध के कारण यह युद्ध वह हार गए थे। उसके बाद से यूरोपीय देशों ने हर मामले में अमरीका को आगे रखने का फ़ैसला कर लिया।

ट्रम्प बहुत बुरे दौर से गुज़र रहे हैं उनके सिर पर फ़ौलादी इच्छाशक्ति रखने वाली महिला नेन्सी पेलोसी सवार हैं अतः ट्रम्प के बस की बात नहीं है कि वह ईरान के विरुद्ध कोई सामरिक मोर्चा खोलें।

राष्ट्रपति रूहानी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने भाषण में जो होप एलायंस बनाने का सुझाव दिया है और जिसमें फ़ार्स खाड़ी के देशों को शामिल होने की दावत दी है वह बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि एलायंस में शामिल देश एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें और एक दूसरे पर हमला न करने के लिए वचनबद्ध हों। इस प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए। शायद यह वर्तमान तनाव से बाहर निकलने का रास्ता साफ़ कर दे। विशेषकर इसलिए भी कि कोई और विकल्प नहीं है। क्या अरब देशों को इस बात का इंतेज़ार है कि अमरीका फिर चुपके से ईरान के साथ बातचीत शुरू कर दे और फिर ईरान की शर्तों पर ईरान से कोई समझौता कर ले और अरब एक बार फिर निराशा में डूब जाएं?

यह तो तय है कि इन अरब देशों की ओर से ट्रम्प कभी भी ईरान से युद्ध नहीं करेंगे यदि कोई इससे अलग सोचता है तो वह ख़ुद को धोखा दे रहा है।

हम ईरान की ओर से दिए गए प्रस्ताव का समर्थन करते हैं। इससे उन सरकारों के लिए अच्छा रास्ता खुल गया है जो अरब और इस्लामी दुनिया के सिद्धांतों को छोड़कर कहीं बहुत दूर निकल गई हैं। यदि इस प्रस्ताव को गंभीरता से लिया जाए तो पूरे इस्लामी जगत का ध्यान असली दुशमन यानी इस्राईल पर केन्द्रित हो सकता है। इन देशों को सोचना चाहिए कि यदि वह सैकड़ों अरब डालर की रक़म अदा करके अपनी रक्षा की ओर से संतुष्ट हैं तो वह वास्तव में दलदल में डूबते जा रहे हैं और राष्ट्र तथा आने वाली पीढ़ियों का पैसा बर्बाद कर रहे हैं।