शायद ही ऐसा कोई समय आया हो जब उसकी बेपनाह दौलत व्यर्थ लग रही हो। अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सार्वजनिक रूप से किसी महाशक्ति के नेता से अधिक एक कंट्रैक्टर की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वे अपने सऊदी दोस्तों और अन्य अरब सहयोगियों से खुलेआम कह रहे हैं कि अगर आपको वाशिंगटन से सुरक्षा चाहिए तो आप उसके लिए भुगतान कीजिए।
अगर कोई उनके हालिया बयानों पर नज़र डालेगा तो उसके लिए स्पष्ट हो जाएगा कि वह ईरान के साथ युद्ध नहीं चाहते हैं, बल्कि उन्हें यह आशा है कि ईरान वार्ता की मेज़ पर आ जाएगा। हालांकि ईरान के वरिष्ठ नेता ने यह कह कर इस आशा पर पानी फेर दिया है कि ईरान किसी भी स्तर पर सीधे अमरीका से बात नहीं करेगा।
आज, यह पहले से कहीं अधिक यथार्थवादी लगता है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अगर कभी राजा का ताज पहन भी लिया तो संभवतः वह आले सऊद राजवंश के अंतिम शासक होंगे।
इस स्थिति का सबसे अधिक फ़ायदा किसे पहुंच रहा है?
अभी किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी। यह न तो ईरानी होंगे और न ही क़तरी, बल्कि इस क्षेत्र के उसके सबसे बड़े सहयोगी इमाराती होंगे। विशेष रूप से अबूधाबी के क्राउन प्रिंस और यूएई के वास्तविक शासक शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद।
जबसे सऊदी अरब ने मुस्लिम जगत का नेता बनने के प्रयास शुरू किए हैं, उसने उसे अभूतवूर्व क्षति पुहंचाई है। मोहम्मद बिन ज़ायद (एमबीज़ैड) की साज़िशों की बदौलत, जिन्होंने आज़ादी और लोकतंत्र के लिए मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीक़ा की अरब जनता की आकांक्षाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई की अगुवाई करने में न केवल सऊदी अरब को उलझाया, बल्कि लगातार मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) के कान में फुसफुसाया कि वह वास्तव में राजा बन सकते हैं अगर वह केवल उनकी सलाह पर ध्यान दें तो।
एमबीज़ैड के सलाह और मश्वरे हमेशा से ही सऊदी अरब के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं रहे हैं। यमन टकराव का युद्ध में बदलना जहां सऊदी अरब के लिए एक दलदल साबित हुआ है, वहीं यूएई के लिए एक ऐतिहासिक अवसर।
इस युद्ध में लगने वाले घावों से सऊदी अरब के जहां लगातार ख़ून रिस रहा है, वहीं यूएई ने यमन को कम से कम दो भागों में बांटने का खेल शुरू कर रखा है और उसने इस देश की सबसे रणनीतिक बंदरगाह पर क़ब्ज़ा किया हुआ है।
ऐसा माना जा रहा है कि यमन के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करने का असली विचार एमबीज़ैड ने ही दिया था। योजना यह थी कि यमन में मुस्लिम ब्रदरहुड को नष्ट करने के लिए हौसियों का इस्तेमाल किया जाएगा, इसलिए कि ऐसी संभावना थी कि अगर लोकतांत्रिक रूप से इस देश में चुनाव हो जाते हैं तो वे चुनाव जीत जायेंगे।
लेकिन यह योजना उल्टी पड़ गई, जो जाल उन्होंने मुस्लिम ब्रदरहुड या इसलाह के लिए बिछाया था उसमें ख़ुद ही फंस गए, इसिलए कि ब्रदरहुड वाले हौसियों से नहीं टकराए।
अब हम देख रहे हैं कि यमन युद्ध अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन हौसी पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं और दिन प्रतिदिन देश पर उनका कंट्रोल मज़बूत होता जा रहा है। इस युद्ध में अगर सबसे अधिक नुक़सान और अपमानजनक पराजय किसी की हुई है तो वह सऊदी अरब ही है।