19 सितंबर 2019 - 17:15

ईरान की फार्स न्यूज़ एजेन्सी ने अमरीकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क टाइम्ज़ में छपे एक लेख के कुछ हिस्सों को संक्षेप में पेश किया है जो पढ़ने योग्य है।

न्यूयॉर्क टाइम्ज़ में प्रकाशित अपने एक आलेख में बिल क्रिस्टल ने लिखा है कि वाशिंग्टन को रियाज़ की ओर से युद्ध करके खुद को सऊदी एजेन्ट नहीं बनाना चाहिए।

न्यूयॉर्क टाइम्ज़ के इस प्रसिद्ध लेखक ने लिखा है कि अमरीका के भूतपूर्व रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने एक बार व्यंग्य में कहा था कि सऊदी अरब ईरान से युद्ध करना चाहता है ... अमरीकी सैनिकों के खून की अंतिम बूंद तक! अब यह खतरा बढ़ रहा है कि हम इस भयानक स्थिति में फंस जाएं।

माइक पोम्पियो ने ईरान को आरामको पर हमलो का ज़िम्मेदार बता कर कार्यवाही की बात की है तो ईरान ने कहा है कि हर अतिक्रमण का ठोस उत्तर दिया जाएगा। इन हालात में सचमुच राष्ट्रपति ट्रम्प बड़ी जटिल स्थिति में फंस गये हैं। अगर अमरीका ईरान को उत्तर नहीं देता तो एक कमज़ोर वाशिंग्टन की छवि बनेगी और अगर हमला करता है तो  उसके बाद की स्थिति, पहली स्थिति से अधिक खतरनाक है क्योंकि हालात बड़ी  तेज़ी से काबू से बाहर हो जाएंगें। ईरान सऊदी अरब, यूएई या बहरैन के कुछ इलाकों पर हमले करेगा और इराक़ व अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिकों पर हमले आरंभ हो जाएंगे।

वह लिखते हैं कि ईरान के साथ व्यापक युद्ध, एक त्रासदी होगी। ईरान की आबादी इराक़ से दोगुनी है और वह इराक़ की तुलना में बहुत ज़्यादा मज़बूत पक्ष साबित होगा। इस आधार पर ट्रम्प वास्तव में एक पेचीदा समस्या में फंस गये हैं। अगर कुछ न करेंगे तो अमरीका कमज़ोर समझा जाएगा और अगर कुछ करेंगे तो फिर हालात बेक़ाबू होकर त्रासदी बन जाएंगे और यह वह समस्या है जिसे स्वंय ट्रम्प ने पैदा किया है।

न्यूयॉर्क टाइम्ज़ ने लिखा है कि हम समस्या में फंसे हैं क्योंकि ट्रम्प ईरान के साथ सन 2015 के परमाणु समझौते से निकल गये हैं। युद्ध प्रेमी यह तर्क पेश करते थे कि हम ईरान पर अधिकतम दबाव डाल कर उसे इतनी पीड़ा में ग्रस्त कर सकते हैं कि वह अन्त में घुटने टेकने पर मजबूर हो जाएगा लेकिन उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि ईरान भी हम पर दबाव डाल सकता है। युद्धप्रेमियों की गलती यही है। वह शतरंज की बिसात बिछाते हैं, मोहरे सजाते हैं और  कल्पना में ही सामने वाले पक्ष को हराने की योजना तैयार कर लेते हैं लेकिन वह युद्ध का एक अत्यन्त आरंभिक सिद्धांत भूल जाते हैं कि दूसरा पक्ष भी चाल चलता है।क्रिस्टल लिखते हैं कि जेसीपीओए के न होने की दशा में सारे विकल्प बुरे हैं इस लिए इस समझौते में अमरीका की वापसी का सम्मानजनक रास्ता खोजा जाना चाहिए जिससे दोनों पक्ष स्वंय को विजय कह सकें।  हमें सऊदी अरब का पहरा देने वाला पालतु कुत्ता नहीं बनना चाहिए। हां ईरान खतरा है लेकिन सऊदी अरब भी है। सऊदी अरब ने लेबनान के प्रधानमंत्री का अपहरण किया था, क़तर से झगड़ा बढ़ाया और यमन में विश्व की सब से अधिक भयानक त्रासदी का जनम दिया। तेल प्रतिष्ठानों पर हमला अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है इसी तरह अमरीका में रहने वाले वाशिंग्टन पोस्ट के पत्रकार को टुकड़े टुकड़े करना भी अपराध है। सऊदी अरब अपने तेल प्रतिष्ठानों पर हमले के बारे में अंतरराष्ट्रीय जांच समिति को निमंत्रण का साहस करता है किंतु इस के साथ ही मेरे दोस्त, जमाल खाशुकजी की हत्या के बारे में अंतरराष्ट्रीय जांच का रुकवाता है। अगर सऊदी अरब ईरान के साथ युद्ध करना चाहता है तो उसे स्वंय यह काम करना होगा, यह युद्ध हमारा युद्ध नहीं है तो फिर उसे हमारी वधशाला भी नहीं बनना चाहिए।