18 सितंबर 2019 - 17:36
पांच महीने में दो बार चुनाव, फिर भी नेतनयाहू बहुमत से दूर, ज़ायोनी सरकार के गठन में नेतनयाहू के दोस्त से बने दुश्मन की अहम भुमिक

बिनयामिन नेतनयाहू के ख़िलाफ़ खड़े दिख रहे ज़ायोनी शासन के पूर्व युद्ध मंत्री और चरमपंथी नेता अविग्दोर लीबरमैन कभी उनके क़रीबी सहयोगी रह चुके हैं। चुनावी नतीजे अस्पष्ट रहने के बाद यह माना जा रहा है कि इस्राईल का नया प्रधानमंत्री वही बनेगा जिसका लीबरमैन साथ देंगे।

पांच महीने में दूसरी बार अवैध ज़ायोनी शासन में चुनाव कराने में लीबरमैन की अहम भूमिका रही है। इस बार के नतीजे भी किसी एक पक्ष के समर्थन में नहीं आए हैं। लिकुद पार्टी के मुखिया नेतनयाहू और ब्लू एंड वाइट के बेनी गांज में से कोई भी बहुमत नहीं पा सका है। ऐसे में 120 सीटों वाली संसद में लीबरमैन के समर्थन के बिना किसी की भी सरकार बनना मुश्किल है। इस तरह देखा जाए तो इन चुनावों में बिना खड़े हुए ही जो विजेता बना है वह खुद लीबरमैन ही हैं। नेतन्याहू की कैबिनेट में युद्ध मंत्री रह चुके लीबरमैन ने अप्रैल के चुनावी नतीजों के बाद उनके नए गठबंधन का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था। उन्होंने चरमपंथी नेता की पहचान रखने वाले लिबरमैन ने नेतनयाहू पर अति-रुढ़िवादी यहूदी पार्टियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और उनसे दूरी बना ली थी। पिछले चुनाव में उनकी एक सीट के कारण ही नेतनयाहू संसद में अपना बहुमत साबित नहीं कर सके थे। जिसके बाद भी नेतनयाहू ने किसी और को अपनी जगह खड़ा कर सरकार बनाने के बजाए संसद को भंग कर दिया और दोबारा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी। दोनों ज़ायोनी नेताओं के बीच पिछले चुनाव के बाद से दोस्ती दुश्मनी में बदल गई और नेतनयाहू ने पिछले चुनाव का बदला लेने के लिए अपने चुनाव प्रचार के दौरान लीबरमैन पर जम कर हमला भी किया था।

इस्राईल में संपन्न हुए चुनाव के बाद अब अब हालात पलट सकते हैं। एक्ज़िट पोल की मानें तो लीबरमैन की यिस्राएल बाइतेनू पार्टी संसद में 8 से 10 सीटें जीत सकती है। उन्होंने अपना चुनाव प्रचार अभियान इस्राईल के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बचाए रखने के नाम पर चलाया और एक सेकुलर गठबंधन सरकार बनाने का वादा किया था। लीबरमैन ने "ज़ायोनी शासन को फिर से सामान्य बनाने" का नारा दिया है। नतीजे आने के बाद लीबरमैन ने पार्टी मुख्यालय पर कहा, "हमारे सामने केवल एक विकल्प है, एक विस्तृत, उदार, राष्ट्रीय सरकार बनाने का, जिसमें यिस्राएल बाइतेनू, लिकुद और ब्लू एंड वाइट सब हों।" 69 साल के दक्षिणपंथी विचारधारा वाले नेतनयाहू के लिए इन चुनावों में बहुत कुछ दांव पर लगा है। अप्रैल में हुए चुनाव में भी उनकी पार्टी को ज़ायोनी शासन के पूर्व सेना प्रमुख बेनी गांज के नेतृत्व वाली मध्यमार्गी ब्लू एंड वाइट गठबंधन से कड़ी चुनौती मिली थी। इस्राएल में कुल 64 लाख पंजीकृत मतदाता हैं। पिछले 13 साल से इस अवैध शासन के प्रधानमंत्री पद पर बने हुए नेतनयाहू एक बार फिर सत्ता में आने पर संसद में ऐसा प्रस्ताव पास करवा सकते हैं जिससे उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में सज़ा ना दी जा सके।

अपने मतदाताओं को रिझाने के लिए नेतनयाहू ने जॉर्डन वैली को ज़ायोनी शासन में शामिल करने का वादा भी किया था। अवैध अतिग्रहित ज़ायोनी शासन का क़रीब एक तिहाई हिस्सा जॉर्डन वैली में पड़ता है। विरोधियों का आरोप है कि नेतनयाहू इस्राईल की एक बड़ी आबादी पर कट्टरपंथी यहूदी धार्मिक क़ानून थोपना चाहते हैं। इस बीच अब सारी निगाहें ज़ायोनी शासन के राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन पर टिकी हुई हैं कि वे किसे एक स्थाई सरकार बनाने का न्यौता देते हैं। वे सभी पार्टियों से परामर्श कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सबके सुझावों पर विचार करने के बाद रुवेन रिवलिन फैसला लेंगे। आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी के नेता को न्यौता मिलता है लेकिन यह कोई नियम नहीं है। किसी भी स्थिति में सरकार बनने के लिए लीबरमैन का साथ होना ज़रूरी दिख रहा है और लीबरमैन, नेतनयाहू से अपनी दुश्मनी को बदला देने के मूड में दिख रहे हैं।