अमेरिकी राष्ट्रपति यूरोप के दौरे पर हैं। जी7 देशों की बैठक में भाग लेने फ्रांस गुए हुए हैं। अगस्त महीने के अंत में दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत की 80वीं वर्षगांठ के समारोह में शामिल होने पोलैंड भी जाएंगे। ट्रम्प बार-बार जर्मनी के पड़ोसी देशों की यात्रा तो कर रहे हैं लेकिन उनकी अभी या निकट भविष्य में जर्मनी जाने की कोई योजना नहीं है। पिछले दो वर्षों में ट्रम्प और एंगेला मैर्केल जर्मनी में सिर्फ एक बार मिले हैं। 2017 के जी20 सम्मेलन के दौरान हैम्बर्ग में हुई मुलाक़ात के अलावा ट्रम्प और मैर्केल के बीच कोई मुलाक़ात नहीं हुई है। इन दो वर्षों में ट्रम्प कभी बर्लिन भी नहीं गए।
अमेरिका और जर्मनी जो दो दोस्ते देश माने जाते रहे हैं उनके बीच पड़ती दरार को लेकर अब प्रश्न उठने शुरू हो गए हैं। राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास के पीछे एक नहीं बहुत सारे कारण हैं। टीकाकारों के मुताबिक़, जर्मनी का रक्षा ख़र्च, ईरान पर जर्मनी की राय, रूस की नोर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन का समर्थन और अमेरिका ने बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में हिस्सा लेने से चीन पर लगाए प्रतिबंध का मैर्केल का विरोध, यह ऐसे अहम मुद्दे हैं जिनकी वजह से मैर्केल और ट्रम्प के रिश्तों में खटास आई है।
दूसरी ओर राजनीतिक तनाव के अलावा देखा गया है कि ट्रम्प और मैर्केल के बीच संबंध अच्छे नहीं रहे हैं। एक अतंर्राष्ट्रीय समारोह में भी ट्रम्प और मैर्केल ने हाथ तक नहीं मिलाया था। विदेशी संबंधों की जर्मन काउंसिल में अमेरिकी विशेषज्ञ योसेफ ब्रामल कहते हैं, "जर्मनी के साथ चल रहे संबंधों के उतार चढ़ाव के साथ ग्रीनलैंड को बेचने के इंकार के बाद ट्रम्प ने सितंबर में प्रस्तावित डेनमार्क की यात्रा को रद्द कर दिया है। यह उनकी लेन-देन वाली नेतृत्व शैली को दिखाता है। ब्रामल कहते हैं कि, ट्रम्प अपने आप को एक बॉस की तरह देखते हैं वह अपना स्पष्ट लक्ष्य और मांगें रखते हैं, उनके पूरा होने या ना होने पर वह दूसरों को फ़ायदे या नुक़सान के रूप में इनाम या सज़ा देते हैं।"ब्रामल के मुताबिक़, "यही वजह है कि जर्मनी और डेनमार्क को 'सज़ा' दी जा रही है या उन्हें अनदेखा किया जा रहा है। पोलैंड फिलहाल कई मुद्दों पर अमेरिका का साथ देता दिख रहा है, इसलिए ट्रम्प पोलैंड से ख़ुश हैं और यही कारण है कि अमेरिका पर आजकल जर्मनी से अधिक पोलैंड का प्रभाव है।"
ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद जर्मनी और अमेरिका के रिश्तों की गर्मजोशी में कमी आई है, लेकिन ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद पोलैंड और अमेरिका की नज़दीकियां बढ़ी हैं। वॉशिंगटन में एक हैरिटेज फाउंडेशन चलाने वाले नील गार्डिनर कहते हैं, "पोलैंड का जर्मनी से अधिक प्रभाव है। नील गार्डिनर कहते हैं कि मैं कहूंगा कि पोलैंड ब्रिटेन के बाद अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा सहयोगी बन चुका है।" हालांकि ब्रामल का कहना है कि पोलैंड को अमेरिका के साथ बने इन नए रिश्तों को लेकर थोड़ा सतर्क रहने की भी ज़रूरत है। वह कहते हैं कि, "पूर्वी यूरोप में ट्रम्प के इन नए दोस्तों को बेवकूफ़ नहीं बनना चाहिए। अमेरिका का यह क़दम कहीं ना कहीं यूरोपीय संघ को बांटने की कोशिश जैसा है।"
इस बीच जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था कि जगह उन छोटे देशों को प्राथमिकता देना जो यूरोपीय संघ के साथ फिलहाल टकराव की स्थिति में हैं, इस संबंध में अमेरिका के पीटरसन इंस्टीट्यूट ऑफ इकनॉमिक्स में सीनियर फेलो जैकब क्रिकगार्ड का कहना है कि, "यूरोप में ट्रम्प के दौरे यूरोपीय संघ में फूट डालने की कोशिश ही है, उनकी सरकार ने यह तो बिल्कुल साफ़ कर ही दिया है कि वह अब एकपक्षवाद के नहीं बहुपक्षवाद के समर्थन में हैं। इस बीच जर्मन सरकार के अनुवाद सहयोगी पीटर बेयर कहते हैं कि अमेरिका के साथ जर्मनी के अच्छे रिश्ते होना प्राथमिकता में है लेकिन अमेरिका का ईयू के साथ बर्ताव यूरोपीय संघ की एकता के लिए ठीक नहीं है। ट्रम्प लगातार ब्रेक्ज़िट पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का साथ देते रहे हैं। इसके अलावा जर्मनी में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड ग्रेनेल ने कहा था कि अमेरिका अपनी सेना को जर्मनी से हटाकर पोलैंड में तैनात करने पर भी विचार कर सकता है। बेयर कहते हैं कि, "ट्रम्प की सरकार शुरुआत से ही यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश करती रही है इसलिए ईयू के सदस्य देशों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।" (रविश ज़ैदी)